मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 1 March

🔴 भावनाओं का विस्तार अपने आप से करना है। व्यक्तिगत चरित्र निर्माण से यह प्रक्रिया प्रारम्भ होती है, धीरे-धीरे परिवार, गाँव, समाज, राष्ट्र और विश्व के साथ उसका सामंजस्य बढ़ता जाता है। इसी क्रम में व्यक्ति का निज का ज्ञान, बौद्धिक विकास और ईश्वर अनुभूति की सिद्धि प्राप्त होती है। यह आत्मयोग ही ब्रह्म ज्ञान का सबसे सीधा और सरल रास्ता है।

🔵 मन बड़ा शक्तिशाली है। पर उससे कोई विशिष्ट लाभ तभी प्राप्त किया जा सकता है जब उसे पूर्ण नियंत्रण में रखा जाय। जीवन लक्ष्य की प्राप्ति, साँसारिक सुख सुविधायें प्राप्त करने के लिए भी यह शर्त अनिवार्य है। हमारा मन वश में हो जाय तो इस जीवन को स्वस्थ व समुन्नत बना सकते हैं और पारलौकिक जीवन का भी मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।

🔴 क्रोध के आवेग में जो कुछ भी हो जाय कम ही है। यह व्यक्ति के सर्वनाश का संकेत है क्योंकि इसका आवेग आने पर मनुष्य की सोचने विचारने की शक्ति क्षीण हो जाती है और वह आवेग में कुछ भी कर सकता है। मार पीट, कत्ल, आत्महत्या, नृशंस घटनायें क्रोध के आवेग में ही घटती हैं। सन्त तिरुवल्लरु के शब्दों में “आवेग उसे ही जलाता है जो उसके पास जाता है किन्तु क्रोध तो पूरे परिवार, समाज को संतप्त कर देता है। क्रोध एक प्रकार की आँधी है, जब वह आती है तो विवेक को ही नष्ट कर देती है और अविवेकी व्यक्ति ही समाज में अपराध तथा बुराइयों के कारण बनते हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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