रविवार, 18 दिसंबर 2016

👉 यह समय युगपरिवर्तन का


  🔵 मित्रो ! सुदामा बगल में दबी चावल की पोटली देना नहीं चाहते थे, सकुचा रहे थे, पर उनने उस दुराव को बलपूर्वक छीना और चावल देने की उदारता परखने के बाद ही द्वारिकापुरी को सुदामापुरी में रूपांतरित किया। भक्त और भगवान् के मध्यवर्ती इतिहास की परंपरा यही रही है। पात्रता जाँचने के उपरांत ही किसी को कुछ महत्त्वपूर्ण मिला है। जो आँखें मटकाते, आँसू बहाते, रामधुन की ताली बजाकर बड़े-बड़े उपहार पाना चाहते, हैं, उनकी अनुदारता खाली हाथ ही लौटती है। भगवान् को ठगा नहीं जा सकता है । वे गोपियों तक से छाछ प्राप्त किए बिना अपने अनुग्रह का परिचय नहीं देते थे। जो गोवर्धन उठाने में सहायता करने के हिम्मत जुुटा सके, वही कृष्ण के सच्चे सखाओं में गिने जा सके।

🔴 यह समय युगपरिवर्तन जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य का है। इसे आदर्शवादी कठोर सैनिकों के लिए परीक्षा की घड़ी कहा जाए, तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति नहीं समझी जानी चाहिए। पुराना कचारा हटता है और उसके  स्थान पर नवीनता के उत्साह भरे सरंजाम  जुटते हैं। यह महान् परिवर्तन  की-महाक्रांति की वेला है। इसमें  कायर, लोभी, डरपोक और भाँड़  आदि जहाँ-तहाँ छिपे  हों तो उनकी ओर घृणा व तिरस्कार की दृष्टि डालते हुए उन्हें अनदेखा भी किया जा सकता है। यहाँ तो प्रसंग हथियारों से सुसज्जित सेना का चल रहा है। वे ही यदि समय को महत्त्व व आवश्यकता को न समझते हुए, जहाँ-तहाँ मटरगस्ती करते फिरें और समय पर हथियार न पाने के कारण  समूची सेना को परास्त होना पड़े तो ऐसे व्यक्तियों पर तो हर किसी का रोष ही बरसेगा, जिनने आपातस्थिति में भी प्रमाद बरता और अपना तथा अपने देश के गौरव को मटियामेट करके रख दिया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 प्रज्ञावतार की विस्तार प्रक्रिया पृष्ठ-२३

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न...