मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 9) 14 Dec

🌹 महान् प्रयोजन के श्रेयाधिकारी बनें  

🔴 गिरने-गिराने की, मिटने-मिटाने की ध्वंसात्मक योजनाओं में, अनेकों मनचले साथ देने, सहायता करने के लिए सहज ही तैयार हो जाते हैं। होली जलाने के कौतूहल हेतु, छोटे बच्चों से लेकर किशोर युवकों तक का एक बड़ा समूह लकड़ियाँ बीनते देखा जाता है। जब उस ढेर में आग लगती है तो तालियाँ बजाने और हुल्लड़ मचाने वालों की भी कमी नहीं रहती। कठिनाई तब पड़ती है जब छप्पर छाने की आवश्यकता पड़ती है। बुलाने पर भी पड़ोसी तक आनाकानी और बहानेबाजी करते देखे गए हैं। तब काम अपने बलबूते ही आरम्भ करना पड़ता है।

🔵 कवि टैगोर ने ठीक ही कहा था कि यदि सत्प्रयोजन की दिशा में कुछ करना सँजोना हो तो— ‘‘एकला चलो रे’’ की नीति अपनानी चाहिए। गीताकार के परामर्शानुसार सारा संसार जब मोह निद्रा में लम्बी तानकर सो रहा हो, तब भी योगी को प्रचलन के विपरीत जागते रहने की, जनसुरक्षा की हिम्मत जुटानी चाहिए।

🔴 निविड़ अन्धकार से निपटने के लिए जब माचिस की एक तीली अपने को जलाने का साहस सँजोकर प्रकट होती है तो दीपक उस तीली के बुझने से पहले ही अपने को ज्योर्तिमय कर लेते हैं। इतना ही नहीं, दीवाली जैसे विशेष पर्वों पर प्रज्ज्वलित दीपकों की विशालकाय वाहिनी तक स्थान-स्थान पर जगमगाती दृष्टिगोचर होती है। अकेले चल पड़ने वालों का उपहास और विरोध आरम्भ में ही होता है, पर जब स्पष्ट हो जाता है कि उच्चस्तरीय लक्ष्य की दिशा में कोई चल ही पड़ा, तो उसके साथी-सहयोगी भी क्रमश: मिलते और बढ़ते चले जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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