मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 6) 28 Dec

🌹 स्नान और उसकी अनिवार्यता

🔴 रेशम के कपड़े पूजा में प्रयुक्त करते समय प्राचीन काल की और आज की परिस्थिति के अन्तर को भी ध्यान में रखना होगा। प्राचीन काल में कीड़े बड़े होकर जब उड़ जाते थे तब उसके छोड़े हुए खोखले ही से रेशम निकाला जाता था। यह अहिंसक उपलब्धि थी। पर आज तो अधिकांश रेशम जीवित कीड़ों को पानी में उबाल कर उनका खोखला उपलब्ध करके प्राप्त किया जाता है। इसमें मारने वालों की तरह पहनने वाले भी अहिंसा के नियम का उल्लंघन करने के दोषी बनते हैं। इस प्रकार अहिंसा युक्त तरीके से प्राप्त हुआ रेशम पूजा उपचार में तो निषिद्ध ही माना जाय। अच्छा तो यह है कि उनका उपयोग सामान्य पहनने के लिए भी न किया जाय।

🔵 पशु चर्म के आसनों के सम्बन्ध में भी यही बात है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि जंगलों में रहते थे। वहां अपनी मौत से मरे हुए वन्य पशुओं का चमड़ा जहां-तहां आसानी से उपलब्ध होता रहता था। आच्छादन के अन्य साधन उन दिनों वनवासी लोगों के लिए सहज उपलब्ध भी न थे। ऐसी दशा में उनके लिए आच्छादन में मृग, सिंह, व्याघ्र आदि का आसन, आच्छादन प्रयुक्त करना उचित था। पर आज तो जितना भी पशु चर्म उपलब्ध होता है उसमें 99 प्रतिशत वध किए गये पशुओं का ही होता है। इस प्रकार हिंसा पूर्वक प्राप्त किये गये चमड़े और मांस में कोई अन्तर नहीं पड़ता।

🔴 आज जब आसन के लिए ऊनी, सूती, कुशा, चटाई आदि के अनेक प्रकार के बिना हिंसा के प्राप्त आसन सर्वत्र उपलब्ध हैं, तो फिर पशुचर्म का उपयोग करने की क्या आवश्यकता? अहिंसक विधि से बनने वाले आसन ही उपयुक्त हैं। इस दृष्टि से कुशासन को अधिक पवित्र मानने की परम्परा ही अधिक उपयुक्त है। धोना न बन पड़े तो भी धूप में सुखाकर आच्छादनों को पवित्र करने का शुद्धि कृत्य तो चलते ही रहना चाहिए। स्नान में जितनी शिथिलता अनिवार्य हो उतनी ही कमी करना चाहिए। जितना अधिक बन पड़े उसी का प्रयत्न करना चाहिए।

🔵 उपासना काल के मध्य में यदि मूत्र विसर्जन के लिए जाना पड़े तो हाथ-पैर धोकर फिर बैठा जा सकता है। छींक, अपानवायु, जम्हाई आदि आने पर तीन आचमन कर लेने से शुद्धि हो जाती है। बीच में शौच जाना पड़े तो स्नान अनिवार्य नहीं। जितना बन पड़े हाथ, पैर, मुंह धो लेने आदि से भी काम चल सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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