रविवार, 18 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 38) 19 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा

🔵 सूक्ष्म दृष्टि से यह निरीक्षण करते रहना चाहिये कि घर के हर एक स्त्री, पुरुष, बालक को शारीरिक और मानसिक उन्नति का समुचित अवसर मिल रहा है या नहीं? जीवन विकास और भविष्य निर्माण के स्वाभाविक अधिकार से कोई वंचित तो नहीं हो रहा है? किसी अनावश्यक सुविधा और किसी पर अनुचित दबाव तो नहीं पड़ रहा है? इन तीनों प्रश्नों पर बारीकी से नजर डालते रहने से यह बात मालूम होती रहती है कि  किस व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है।

🔴 कुछ ऐसी प्रथा चल पड़ी हैं कि लड़कियों की अपेक्षा लड़कों को, स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों को, और बिना कमाने वालों या कम कमाने वालों की अपेक्षा अधिक कमाने वाले को, अधिक सुविधा दी जाती है। खाने, पहनने, मनोरंजन तथा सम्मान पाने में वे आगे रहते हैं। बेचारी लड़कियां और स्त्रियां तो एक प्रकार के फालतू प्राणी समझे जाते हैं, उनकी सुविधा एवं आवश्यकता और विकास की ओर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। यह अन्याय मिटना और मिटाया जाना चाहिए। स्त्रियों, लड़कियों, न कमाने वालों और रोगी, वृद्ध या असमर्थों को भी उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप समुचित सुविधायें मिलनी चाहिये।

🔵 यह चिन्ता करना गलत है कि कम आमदनी होने के कारण घर के सब लोगों की आवश्यकता किस प्रकार पूरी की जा सकेगी? छोटी आमदनी होने पर जीवन निर्वाह का व्यवस्था क्रम मितव्ययी और सादगीपूर्ण बना लेना चाहिए। मोटा कपड़ा, मोटा अनाज, साधारण रहन-सहन रखने और टीपटाप, फैशन, तड़क-भड़क, दिखावट की अनावश्यक चीजों का स्वेच्छा और प्रसन्नता पूर्वक त्याग कर देने से थोड़ी आमदनी में अच्छी तरह काम चल सकता है। अमीर, फिजूल खर्च, फैशन परस्त, छैल छबीले लोगों की नकल करने में अनावश्यक पैसा खर्च करने में कुछ भी बुद्धिमानी नहीं है। सादगी में सात्विकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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