शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 31 Dec 2016

🔴 भारत का नारी समाज संकोच, भय छोड़कर महिला उत्कर्ष के अभियान में सम्मिलित हो यही युग की पुकार है। त्याग, बलिदान की तो उसमें कमी नहीं। लोभ, मोह छोड़ने की बात कहने को-कष्ट सहने के लिए तैयार होने का उद्बोधन करने की तो आवश्यकता प्रतीत नहीं होती, यह गुण तो उसमें प्रकृति प्रदत्त और जन्मजात है। उद्बोधन केवल संकोच और झिझक छोड़ने का करना है।

🔵 सफलता प्राप्त कर लेना ही काफी नहीं, उससे आत्म संतोष और जनकल्याण एवं स्वस्थ परम्परा का अभिवर्धन होना चाहिए। सही तरीके से प्राप्त की हुई सफलता ही वास्तविक सफलता है। यदि किसी ने कोई उन्नति या उपलब्धि अनुपयुक्त रीति से प्राप्त की है तो उससे अनेकों को वैसा ही करने की इच्छा उत्पन्न होगी और समाज में एक ऐसी प्रथा चल पड़ेगी जो हर किसी के लिए अहितकर परिणाम ही उत्पन्न करती रहे।

🔴 ऐसी नारियों की कमी नहीं हैं, जो सुयोग्य हैं अथवा सुयोग्य बनने के लायक जिनके पास समय, सुविधाएँ हैं। यदि पुरुष सहयोग करें तो निश्चय ही वे और भी अधिक योग्य बन सकती हैं। जो आज अशिक्षित, अयोग्य हैं उन्हें भी कल प्रशिक्षित एवं सुयोग्य बनाया जा सकता है। विवेकवान् व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वे अपने घर-परिवार की कई महिलाओं में से जिनके पास मनेाबल और अवकाश हो उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करे।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बूढ़ा पिता

🔷 किसी गाँव में एक बूढ़ा व्यक्ति अपने बेटे और बहु के साथ रहता था। परिवार सुखी संपन्न था किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी । बूढ़ा बाप ज...