बुधवार, 28 दिसंबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 Dec 2016

 🔴 इन दिनों आपत्तिकालीन स्थिति है, सामान्य समय नहीं। इन संकट के क्षणों में मानव जाति को अंधकारमय भविष्य के गर्त में गिराने से बचाने के लिए यदि सारा समय लगा दिया जाय और यह मान लिया जाय कि भौतिक जीवन जितना जी लिया उतना ही पर्याप्त है, तो यह अधिक दूरदर्शिता की, अधिक सराहनीय साहसिकता की बात होगी, पर न्यूनतम दो घण्टे तो लगाते ही रहना चाहिए।

🔵 इस युग के हर भावनाशील और जीवित व्यक्ति को गौतम बुद्ध, शंकराचार्य, समर्थ गुरऊ रामदास, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, रामतीर्थ, गाँधी, दयानंद आदि की तरह भरी जवानी में ही कर्मक्षेत्र में ही कूद पड़ना चाहिए, बुढ़ापे का इंतजार नहीं देखना चाहिए, पर इतना साहस न हो तो कम से कम इतना तो करना ही चाहिए कि पके फल की तरह पेड़ में चिपके रहने की धृष्टता न करें। जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व पूरे हो चुके हैं वे घर-गृहस्थी की छोटी सीमा में ही आबद्ध न रहकर विशाल कर्मक्षेत्र में उतरें और जनजागृति का शंख बजाएँ, युग परिवर्तन की कमान सँभालें।

🔴 युग निर्माण परिवार के स्त्री सदस्यों को यह विशेष कर्त्तव्य सौंपा गया है कि अपने पददलित वर्ग को ऊँचा उठाने में अपना ध्यान केन्द्रित करें और अपने वर्ग में सघन संपर्क बनाकर उसे ऊँचा उठाने के लिए आगे, आगे बढ़ाने  के लिए अधिकाधिक योगदान करें। सुख-सुविधाओं को लात मारकर वे नारी जाति के उत्कर्ष के लिए बढ़-चढ़ कर बलिदान प्रस्तुत करें।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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