रविवार, 25 दिसंबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 26 Dec 2016

 🔴 सज्जनोचित परम्परा यही रही है कि यदि किसी के पास अतिरिक्त आय के स्रोत हैं तो उसमें से उपयोग, उपभोग उतना ही करे जितना कि उस समाज के औसत आदमी को उपलब्ध है। शेष को दान के रूप में समाज को वापिस लौटा देना चाहिए। यह प्रथा जब से बंद हुई, लोग लालचवश अधिक संग्रह करने और उसका विलासिता में अधिक उपयोग करने लगे तो समाज अनेक प्रकार के विप्लव, उपद्रव खड़े हो गये।

🔵 चाहे साम्यवादी पद्धति से मनुष्य को बलात् विवश किया जाय कि वह आवश्यकतानुसार लेने और सामर्थ्यानुसार काम करने की सर्वोपयोगी विधि व्यवस्था का पालन करे, चाहे आध्यात्मवादी अपरिग्रही आदर्श स्वेच्छा पूर्वक अपनाने की सादगी का देश के सामान्य नागरिक स्तर का निर्वाह करते हुए जो बचे उसे बिना किसी अहंकार या विज्ञापन के विशुद्ध कर्त्तव्य बुद्धि से समाज को दान रूप में लौटा दे-पद्धति कोई भी क्यों न हो दोनों का निष्कर्ष एक है।

🔴 ब्राह्मण-ब्राह्मण के बीच ऊँच-नीच है और अछूट-अछूत के के बीच छूआछात है। आदमी-आदमी के बीच छोटाई-बड़ाई हो सकती है, पर उसका आधार गुण, कर्म, स्वभाव, सेवा, सदाचार, परमार्थ जैसी उत्कृष्टताएँ होनी चाहिए। किसी को नीच तो माना जा सकता है, पर उसका कारण उसकी दुष्टता, दुबुर्दि ही होनी चाहिए। जन्म, जाति, वंश के रूप में सभी ब्रह्माजी के पुत्र, मनु की संतान हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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