सोमवार, 12 दिसंबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 Dec 2016

 🔴 ‘करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’ यह सिद्धान्त मात्र सूक्ति ही नहीं, बल्कि यह पुरुषार्थी एवं परिश्रमी व्यक्तियों का अनुभव सिद्ध सत्य है। परिश्रम के अभाव में प्रतिभा बेकार पड़ी रहती है, पर काम करते-करते योग्यता का विकास हो जाया करता है। प्रतिभा को उन्नति का आधार मानने वालों को यह बात न भूलनी चाहिए कि परिश्रम प्रतिभा का पिता है।

🔵  सहानुभूति दूसरों का प्रेम पाने का सर्वोत्तम उपाय है और आत्म संतोष का सर्वसुलभ साधन है।  जिस व्यक्ति, जिस समाज में सहानुभूति जिन्दा रहती है, दुःख-दर्द और अभाव में भी वहाँ के प्राणी राहत अनुभव करते हैं और दिव्य प्रेम के आदान-प्रदान का सुख प्राप्त करते हैं।

🔴 विश्वास रखिए संसार के प्रत्येक मनुष्य के भीतर कोई न कोई महान् पुरुष सोया पड़ा रहता है। आपके अंदर भी है। यदि ऐसा न होता तो एक साधारण दीन-हीन मजूदर का अपढ़ पुत्र अब्राहम लिंकन संसार का महान् व्यक्ति न हो पाता। एक जिल्दसाज की नौकरी करने वाला माइकल फैरिडे महान् वैज्ञानिक न होता। साधारण वकील के स्तर से महात्मा गाँधी विश्व बंधु बापू न हो पाते।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें