शनिवार, 10 दिसंबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 Dec 2016

 🔴 देवताओं की प्रसन्नता खुशामद पसंद लोभी व्यक्तियों की तरह सस्ती नहीं होती। उनकी अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए किसी को भी कदम-कदम पर अपने दोष दुर्गुणों को दूर करना होगा, जीवन को पवित्र बनाना होगा। अपने मन, वचन तथा कर्मों में देवत्व का समावेश करना होगा जिसके लिए आत्म-संयम, त्याग तथा तपश्चर्या पूर्वक जीवन साधना करनी होगी अन्यथा केवल देवदर्शन अथवा दक्षिणा-प्रदक्षिणा द्वारा मनोरथ को सिद्ध नहीं कर सकता।

🔵 महत्वाकाँक्षा बुरी नहीं है, सम्मान एवं आदर की इच्छा है, किन्तु यह अहमन्यता, राग, द्वेष, प्रतिहिंसा, स्पर्द्धा, ईर्ष्या अथवा अपात्रत्व से दूषित हो जाती है तो विष बनकर अपने आश्रयदाता को नष्ट कर देती है। हीनता से भड़की हुई महत्ता की भावना प्रायः ध्वंसक बना देती है जिससे मनुष्य ऐतिहासिक होकर भी अपयश के कारण लोक-परलोक दोनों में पाप एवं अपवाद का भागी बनता है।

🔴 यदि उन्नति की आकाँक्षा है तो साहस संचय कीजिए और आगे बढ़िये। जो कुछ है वह भी जा  सकता है इस अनिष्ट आशंका को दूर भगाइए। संसार में कुछ खो कर ही पाया जा सकता है। खतरा पार करके ही विजय मिल सकती है। बीज गलकर ही फसल प्राप्त हो सकती है। बिना साहस किये और खतरा मोल लिये न तो कोई आज तक आगे बढ़ पाया है और न आगे ही उन्नति कर सकेगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 धैर्य से काम

🔶 बात उस समय की है जब महात्मा बुद्ध विश्व भर में भ्रमण करते हुए बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे थे और लोगों को ज्ञान दे रहे थे। 🔷 एक ब...