रविवार, 6 नवंबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 71)

🔵 आपका प्रेम और आशीर्वाद जो कि आपने इतनी कृपापूर्वक मेरे प्रति प्रदर्शित किया उस पर मैंने अपनी बेईमानी से आघात किया। मैं आपके लिये अति अयोग्य था। अपने अंहकार में मैं आपको भूल गया तथा आपके स्थान पर स्वयं को मैंने मनुष्य के नेता के स्थान में बिठा दिया जिससे कि लोग मुझे महान कहें। किन्तु हे प्रभु अब मैंने समझ लिया है। मैंने अपने अशुद्ध हाथों से आपके उपदेशों को दूषित कर दिया तथा आपके उपदेशों को अपवित्र कर दिया। किन्तु आपकी कृपा असीम रही है। मेरे प्रति आपका प्रेम अनिर्वचनीय रहा है। वस्तुत: आपका स्वभाव दिव्य है। माँ का अपने बच्चे के प्रति जो प्रेम है, आपका अपने शिष्य के प्रति प्रेम उससे भी अधिक है।

🔴 हे प्रभु! आपने अपनी शक्ति से मुझपर तब तक आघात किया जब तक कि मैं पूर्ण नहीं हो गया तथा आपने मुझे उसी प्रकार गढ़ा जैसा कि एक कुम्हार मिट्टी के लोंदे को जैसा रूप चाहे वैसा रूप दे देता है। आपकी कृपा, आपका धैर्य, आपकी मधुरता, असीम है। मैं आपकी पूजा करता हूँ। मेरे हाथ, पैर, जीभ, आँखें, कान, मेरा संपूर्ण शरीर, मन इच्छा, भावनायें, मेरा संपूर्ण व्यक्तित्व पूर्णाहुति के रूप में समर्पित हो तथा आपके प्रति मेरी भक्ति की ज्वाला में सब कुछ पवित्र हो जाये। मेरा शुभ, अशुभ, वह सब जो मैं था, हूँ या कभी होऊँगा, जन्म- जन्मान्तर में होऊँगा, वह सब आपके प्रति समर्पित है। आप ही मेरे ईश्वर और मुक्ति हैं। आपही मेरी महान आत्मा हैं। मैं कुछ भी संग्रह न करूँ। आपके हृदय के अतिरिक्त मेरा और कोई घर न हो। अभी इसी क्षण तथा सदैव के लिये मेरा जीवन पवित्रता की प्रभा हो।

हरि: ओम् तत् सत्

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

2 टिप्‍पणियां:

  1. अति सुंदर , अति महान् , अनुकरणीय , अन्तर्मन् से प्रस्फुठित महान् अंतर्वेदना।
    यही वास्तविक आवाज़ है हमारे हृदय की पर हम बार - बाR छुद्रता की ओर गिरते हैं और पश्चाताप करते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. अति सुंदर , अति महान् , अनुकरणीय , अन्तर्मन् से प्रस्फुठित महान् अंतर्वेदना।
    यही वास्तविक आवाज़ है हमारे हृदय की पर हम बार - बाR छुद्रता की ओर गिरते हैं और पश्चाताप करते हैं।

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