शनिवार, 5 नवंबर 2016

👉 जैसी करनी वैसी भरनी

🔵 जो लोग भले होते हैं, वे तो किसी प्रकार उबर आते है पर कुटिल चाल चलने वाले अन्तत : स्वयं गिरते हैं। ऐसे गीदड़ वेशधारी अनेक व्यक्ति समाज में बैठे हैं।

🔴 एक गीदड़ एक दिन गढ्डे में गिर गया। बहुत उछल-कूद की किन्तु बाहर न निकल सका। अन्त में हताश होकर सोचने लगा कि अब इसी गढ्डे में मेरा अन्त हो जाना है। तभी एक बकरी को मिमियाते सुना। तत्काल ही गीदड़ की कुटिलता जाग उठी। वह बकरी से बोला-' बहिन बकरी। यहाँ अन्दर खूब हरी-हरी घास और मीठा-मीठा पानी है। आओ जी भरकर खाओ और पानी पियो। " बकरी उसकी लुभावुनी बातों में आकर, गढ्डे में कूद गयी।

🔵 चालाक गीदड़ बकरी की पीठ पर चढ़कर गढ्डे से बाहर कूद गया और हँसकर बोला-"तुम बड़ी बेवकूफ हो, मेरी जगह खुंद मरने गट्टे में आ गई हो। " बकरी बड़े सरल भाव से बोली-"गीदड़ भाई, मेरी उपयोगितावश कोई न कोई मुझे निकाल ही लेगा किन्तु तुम अपने ही क्षणों के कारण विनाश के बीज वो लोगे।

🔴 थोड़ी देर में मालिक ढूँढ़ता हुआ बकरी को निकाल ले गया। रास्ते में जा रही बकरी ने देखा वही गीदड़ किसी के तीर से घायल हुआ झाड़ी में करहा रहा  है।

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