सोमवार, 14 नवंबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 15 Nov 2016

🔴 आत्म-विश्वास अनियंत्रित भावुकता का नाम नहीं है, वरन् उस दूरदर्शिता का नाम है, जिसके साथ संकल्प और साहस जुड़ा रहता है। ऐसे आत्म-विश्वासी जो भी काम करते हैं उसमें न तो ढील-पोल होती है, न उपेक्षा और न गैर जिम्मेदारी। वे जो काम करते हैं उसे पूरी भावना, विचारणा और तत्परता के साथ करते हैं। अंततः वे अपने ध्येय में कामयाब हो ही जाते हैं।

🔵 प्रायश्चित का अर्थ है- स्वेच्छापूर्वक दण्ड भुगतना। इसके लिए तैयार हो जाने से यह सिद्ध होता है कि अपराधी को सच्ची सद्बुद्धि उपजी है, उसे वस्तुतः अपनी भूल पर दुःख है। जो किया है, उसका दण्ड बहादुरी से भुगतने की तैयारी है। ऐसा बहादुर ही भविष्य में वैसा न करने की प्रतिज्ञा को निभा सकता है। जिसमें इतना साहस नहीं है, मात्र शब्दाडम्बर से ही अपना बचाव करना चाहता है, उसकी सच्चाई सर्वथा संदिग्ध है।

🔴 पाप एवं पतन के सामने कभी भी आत्म समर्पण नहीं करना चाहिए। उसके प्रति घृणा और प्रतिरोध का भाव सदा जारी रहे। कोई बुराई अपने में हो और छूट नहीं पा रही हो तो भी उसे अपनी कमजोरी या भूल समझकर पश्चाताप ही करें और उससे छुटकारा पाने के लिए यथाशक्ति प्रयत्न जारी रखें। बुराई को भलाई के रूप में स्वीकार करना, उसका समर्थन करना, उसका विरोध छोड़ देना और उसमें रस लेना यह पशुता का चिह्न है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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