शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 12 Nov 2016


🔴 बाढ़, भूकम्प, दुर्भिक्ष, महामारी, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, युद्ध आदि दैवी प्रकोपों को मानव जाति के सामूहिक पापों का परिणाम माना गया है। निर्दोष व्यक्ति भी गेहूँ के साथ घुन की तरह पिसते हैं। वस्तुतः वे भी निर्दोष नहीं होते। सामूहिक दोषों को हटाने का प्रयत्न न करना, उनकी ओर उपेक्षा दृष्टि रखना भी एक पाप है। इस दृष्टि से निर्दोष दीखने वाले व्यक्ति भी दोषी सिद्ध होते हैं और उन्हें सामूहिक दण्ड का भागी बनना पड़ता है।

🔵 मनुष्य को चाहिए कि झूठ से कामना सिद्धन करे। निन्दा, स्तुति तथा भय से भी झूठ न बोले और न लोभवश। चाहे राज्य भी मिलता हो तो झूठ, अधर्म को न अपनावे। भोजन-जीविका बिना भी चाहे प्राण जाते हों, तो भी धर्म का त्याग न करे, क्योंकि जीव और धर्म नित्य है। वे मनुष्य धन्य हैं जो धर्म को किसी भी भाव नहीं बेचते।

🔴 समझदारी का तकाजा है कि संसार चक्र के बदलते क्रम के अनुरूप अपनी मनःस्थिति को तैयार रखें। लाभ, सुख, सफलता, प्रगति, वैभव, पद आदि मिलने पर अहंकार से ऐंठने की जरूरत नहीं है। कहा नहीं जा सकता वह स्थिति कब तक रहेगी। स्थिति कभी भी बदल और उलट सकती है, ऐसी दशा में रोने, झींकने, खीजने, निराश होने में शक्ति नष्ट करना व्यर्थ है। परिवर्तन के अनुरूप अपने को ढालने में, विपन्नता को सुधारने में, उपाय सोचने, हल निकालने और तालमेल बिठाने में यदि मस्तिष्क को लगाया जाय तो वह प्रयत्न रोने, सिर धुनने की अपेक्षा अधिक श्रेयस्कर होगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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