गुरुवार, 17 नवंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 7) 18 Nov

🌹 दृष्टिकोण का परिवर्तन

🔵 आत्मीयता की उन्नति के लिए अभ्यास करने का सबसे अच्छा स्थान अपना घर है। नट अपने घर के आंगन में कला खेलना सीखता है। बालक अपने घर में खड़ा होना और चलना फिरना सीखता है योग की साधना भी घर से ही आरम्भ होनी चाहिए। प्रेम, त्याग और सेवा का, अभ्यास करने के लिये अपने घर का क्षेत्र सबसे अच्छा है। इन तत्वों का प्रकाश जिस स्थान पर पड़ता है वही चमकने लगता है।

🔴  जब तक आत्मीयता के भावों की कमी रहती है तब तक औरों के प्रति दुर्भाव, घृणा, क्रोध, उपेक्षा के भाव रहते हैं किन्तु जब अपने पन के विचार बढ़ते हैं तो हल्के दर्जे की चीजें भी बहुत सुन्दर दिखाई पड़ने लगती है। माता अपने बच्चे के प्रति आत्म भाव रखती है इसलिये यदि वह लाभदायक न हो तो भी उसे भरपूर स्नेह करती है, पतिव्रत पत्नियों को अपने काले कलूटे और दुर्गुणी पति भी इन्द्र जैसे सुन्दर और बृहस्पति जैसे गुणवान लगते हैं।

🔵 दुनियां में सारे झगड़ों की जड़ यह है कि हम देते कम हैं और मांगते ज्यादा हैं। हमें चाहिए कि दें बहुत और बदला बिलकुल न मांगें या बहुत कम पाने की आशा रखें। इस नीति को ग्रहण करते ही हमारे आस पास के सारे झगड़े मिट जाते हैं। आत्मीयता की महान साधना में प्रवृत्त होने वाले को अपना दृष्टिकोण—देने का—त्याग और सेवा का, बनाना पड़ता है। आप प्रेम की उदार भावनाओं से अपने अन्तःकरण को परिपूर्ण कर लीजिए और सगे सम्बन्धियों के साथ त्याग एवं सेवा का व्यवहार करना आरम्भ कर दीजिए।

🔵 कुछ ही क्षणों के उपरान्त एक चमत्कार हुआ दिखाई देने लगेगा। अपना छोटा सा परिवार जो शायद बहुत दिनों से कलह और क्लेशों का घर बना हुआ है—सुख शान्ति का स्वर्ग दीखने लगेगा। अपनी आत्मीयता की प्रेम भावनाएं परिवार के—आस पास के लोगों से टकराकर अपने पास वापिस लौट आती हैं और वे आनन्द की भीनी सुगन्धित फुहार से छिड़क कर मुरझाये हुए अन्तःकरण को हरा कर देती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 क्या मैं शरीर ही हूँ-उससे भिन्न नहीं? (अंतिम भाग)

🔵 मैं काया हूँ। यह जन्म के दिन से लेकर-मौत के दिन तक मैं मानता रहा। यह मान्यता इतनी प्रगाढ़ थी कि कथा पुराणों की चर्चा में आत्मा काया क...