बुधवार, 16 नवंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 6)

🌹 दृष्टिकोण का परिवर्तन

🔵 इस बात को भली प्रकार समझ रखना चाहिए कि योग का अर्थ अपनी तुच्छता संकीर्णता को महानता, उदारता और विश्वबन्धुत्व में जोड़ देना है। अर्थात् स्वार्थ को परिशोधन करके उसे परमार्थ बना लेना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये असंख्य प्रकार के योगों की साधनायें की जाती हैं उन्हीं में से एक गृहस्थ योग ही साधना है। अन्य साधनाओं की अपेक्षा यह अधिक सुखद और स्वाभाविक है। इसलिये आचार्यों ने गृहस्थ योग का दूसरा नाम सहज योग भी रखा है। महात्मा कबीर ने अपने पदों में सहज योग की बहुत चर्चा और प्रशंसा की है।

🔴 किसी वस्तु को समुचित रीति से उपयोग करने पर वह साधारण होते हुए भी बहुत बड़ा लाभ दिखा देती है और कोई वस्तु उत्तम होते हुए भी यदि उसका दुरुपयोग किया जाय तो वह हानिकारक हो जाती है। दूध जैसे उत्तम पौष्टिक पदार्थ को भी यदि अवधि पूर्वक सेवन किया जाय तो वह रोग और मृत्यु का कारण बन सकता है। इसके विपरीत यदि जहर को भी उचित रीति से शोधन मारण करके काम में लाया जाय तो वह अमृत के समान रसायन का काम देता है। गृहस्थाश्रम के सम्बन्ध में भी यही बात है यदि उचित दृष्टिकोण के साथ आचरण किया तो गृहस्थाश्रम के रहते हुए भी ब्रह्म निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है जैसा कि अनेक ऋषि महात्मा योगी और तपस्वी पूर्वकाल में प्राप्त कर चुके हैं।

🔵 आजकल गृहस्थों को दुख, चिन्ता, रोग, शोक, आधि व्याधि, पाप ताप में ग्रसित अधिक देखा जाता है इससे ऐसा अनुमान न लगाना चाहिए कि इसका कारण गृहस्थाश्रम है, यह तो मानसिक विकारों को कुविचार और कुसंस्कारों का फल है। दूषित मनोवृत्तियों के कारण हर एक आश्रम में, हर एक वर्ण में, हर एक देश में ऐसे ही संकट, दुख उपस्थित होंगे। इसके लिये बेचारे गृहस्थाश्रम को दोष देना बेकार है। यदि वह वास्तव में ही दूषित, त्याज्य तथा तुच्छ होता तो संसार के महापुरुषों, अवतारों और युग निर्माताओं ने इससे अपने को अलग रखा होता, किन्तु हम देखते हैं विश्व की महानता का करीब, करीब समस्त इतिहास गृहस्थाश्रम की धुरी पर केन्द्रीभूत हो रहा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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