गुरुवार, 24 नवंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 14) 25 Nov

🌹 विवेक ही हमारा सच्चा मार्गदर्शक

🔵  यह संसार जड़ और चेतन के, सत् और असत् के सम्मिश्रण से बना है। देव और दानव दोनों यहां रहते हैं। देवत्व और असुरता के बीच सदा सत्ता-संघर्ष चलता रहता है। भगवान का प्रतिद्वन्दी शैतान भी अनादिकाल से अपना अस्तित्व बनाये हुए है। परस्पर विरोधी रात और दिन का, अन्धकार और प्रकाश का जोड़ा न जाने कब से जुड़ा चला आ रहा है। कपड़ा ताने और बाने से मिलकर बना है, यद्यपि दोनों की दिशा परस्पर विरोधी है। यहां जलाने वाली गर्मी भी बहुत है। शीतलता देने वाली बर्फ से भी पूरे ध्रुव प्रदेश और पर्वत शिखर लदे पड़े हैं।

🔴  यहां न सन्त-सज्जनों की कमी है और न दुष्ट-दुर्जनों की। पतन के गर्त में गिराने वाले तत्व अपनी पूरी साज-सज्जा बनाये बैठे और अपने आकर्षण जाल में सारे संसार को जकड़ने के प्रयास में संलग्न हैं। दूसरी ओर उत्थान की प्रेरणा देने वाली उत्कृष्टता भी मर नहीं गई है, उसकी प्रकाश किरणों का आलोक भी सदा ही दीप्तिमान रहता है और असंख्यों को श्रेष्ठता की दिशा में चलने के लिए बलिष्ठ सहयोग प्रदान करता है। परस्पर विरोधी सत्-असत् तत्वों का मिश्रण ही यह संसार है। भाप में जल की शीतलता और अग्नि की ऊष्मा का विचित्र संयोग हुआ है, यह संसार भाप से बने बादलों की तरह अपनी सत्ता बनाये बैठा है।

🔵 इस हाट में से क्या खरीदा जाय, क्या नहीं? यह निर्णय करना हर मनुष्य का अपना काम है। पतन या उत्थान में से किस मार्ग पर चलना है? यह फैसला करना पूरी तरह अपनी इच्छा एवं रुचि पर निर्भर है। ईश्वर ने मनुष्य पर विश्वास किया है और इतनी स्वतन्त्रता दी है कि वह अपनी इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति किसी भी दिशा में किसी भी प्रयोजन के लिए उपयोग करे। इसमें किसी दूसरे का, यहां तक कि परमेश्वर तक का कोई हस्तक्षेप नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

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