बुधवार, 9 नवंबर 2016

👉 *हमारी युग निर्माण योजना (भाग 13)

🌹 युग-निर्माण योजना का शत-सूत्री कार्यक्रम

🔵 4. स्वाद की आदत छोड़ी जाय— अचार, मुरब्बे, सिरका, मिर्च, मसाले, खटाई, मीठा की अधिकता पेट खराब होने और रक्त को दूषित करने का कारण होती है। इन्हें छोड़ा जाय। हल्का-सा नमक और जरूरत हो तो थोड़ा धनिया, जीरा सुगन्ध के लिये लिया जा सकता है, पर अन्य मसाले तो छोड़ ही देने चाहिए। शरीर के लिये जितना नमक, शकर आवश्यक है उतना अन्न शाक आदि में पहले से ही मौजूद है।

🔴 बाहर से जो मिलावट की जाती है वह तो स्वाद के लिए है। हमें स्वाद छोड़ना चाहिये। अभ्यास के लिये कुछ दिन तो नमक मीठा बिलकुल ही छोड़ देना चाहिये और अस्वाद व्रत पालन करना चाहिये। आदत सुधर जाने पर हलका-सा नमक, नीबू, आंवला, अदरक, हरा धनिया, पोदीना आदि को भोजन में मिलाकर उसे स्वादिष्ट बनाया जा सकता है। सूखे मसाले स्वास्थ्य के शत्रु ही माने जाने चाहिये। मीठा कम से कम लें। आवश्यकतानुसार गुड़ या शहद से काम चलायें।

🔵 5. शाक और फलों का अधिक प्रयोग— शाकाहार को भोजन में प्रमुख स्थान रहे। आधा या तिहाई अन्न पर्याप्त है। शेष भाग शाक, फल, दूध, छाछ आदि रहे। ऋतु-फल सस्ते भी होते हैं और अच्छे भी रहते हैं। आम, अमरूद, बेर, जामुन, शहतूत, पपीता, केला, ककड़ी, खीरा, तरबूजा आदि-आदि अपनी-अपनी फसलों पर काफी सस्ते रहते हैं। लौकी तोरई, परवल, टमाटर, पालक, मेथी आदि सुपाच्य शाकों की मात्रा सदा अधिक ही रखनी चाहिये।

🔴 गेहूं, चना आदि को अंकुरित करके खाया जाय तो उनसे बादाम जितना पोषक तत्व मिलेगा। उन्हें कच्चा हजम न किया जा सके तो उबाला, पकाया भी जा सकता है। अन्न, शाक और फलों के छिलकों में जीवन तत्व (विटामिन) बहुत रहता है, इसलिये आम, केला, पपीता आदि जिनका छिलका आवश्यक रूप से हटाना पड़े उन्हें छोड़कर शेष के छिलके खाये जाने ही ठीक हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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