गुरुवार, 10 नवंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 1)

🌹 समय का सदुपयोग करना सीखें

🔵 जीवन क्या है? इसका उत्तर एक शब्द में अपेक्षित हो तो कहा जाना चाहिए—‘समय’। समय और जीवन एक ही तथ्य के दो नाम हैं। कोई कितने दिन जिया? इसका उत्तर वर्षों की काल गणना के रूप में ही दिया जा सकता है। समय की सम्पदा ही जीवन की निधि है। उसका किसने किस स्तर का उपयोग किया, इसी पर्यवेक्षण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसका जीवन कितना सार्थक अथवा निरर्थक व्यतीत हुआ।

🔴 शरीर अपने लिए ढेरों समय खर्च करा लेता है। आठ-दस घण्टे सोने सुस्ताने में निकल जाते हैं। नित्य कर्म और भोजन आदि में चार घण्टे से कम नहीं बीतते। इस प्रकार बाहर घण्टे नित्य तो उस शरीर का छकड़ा घसीटने में ही लग जाते हैं जिसके भीतर हम रहते और कुछ कर सकने के योग्य होते हैं। इस प्रकार जिन्दगी का आधा भाग तो शरीर अपने ढांचे में खड़ा रहने योग्य बनने की स्थिति बनाये रहने में ही खर्च हो लेता है।

🔵 अब आजीविका का प्रश्न आता है। औसत आदमी के गुजारे की साधन सामग्री कमाने के लिए आठ घण्टे कृषि, व्यवसाय, शिल्प, मजदूरी आदि में लगा रहना पड़ता है। इसके साथ ही पारिवारिक उत्तरदायित्व भी जुड़ते हैं। परिजनों की प्रगति और व्यवस्था भी अपने आप में एक बड़ा काम है जिसमें प्रकारान्तर से ढेरों समय लगता है। यह कार्य भी ऐसे हैं जिनकी अपेक्षा नहीं हो सकती। इस प्रकार आठ घण्टे आजीविका और चार घण्टे परिवार के साथ बिताने में लगने से यह किश्त भी बारह घण्टे की हो जाती है। बारह घण्टे नित्य कर्म, शयन और बारह घण्टे उपार्जन परिवार के लिए लगा देने पर पूरे चौबीस घण्टे इसी तरह खर्च हो जाते हैं जिसे शरीर यात्रा ही कहा जा सके। औसत आदमी इस भ्रमण चक्र में निरत रहकर दिन गुजार देता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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