सोमवार, 3 अक्तूबर 2016

👉 प्रेम ही सुख-शांति का मूल है The Only Source of Inner Joy

🔴 भगवान ने अपनी सृष्टि को सुंदर और सुव्यवस्थित बनाने के लिए जड़ और चेतन पदार्थों को एक दूसरे से संबंधित कर रखा है। निखिल विश्वब्रह्मांड के ग्रह-नक्षत्र अपने-अपने सौरमंडलों में आकर्षण शक्ति के द्वारा एक-दूसरे से संबंधित हैं। यदि ये संबंध-सूत्र टूट जाएँ, तो किसी की कुछ स्थिरता न रहे। सारे ग्रह-नक्षत्र एक दूसरे से टकरा जाएँ और संपूर्ण व्यवस्था नष्ट हो जाए।

🔵 इसी प्रकार आपसी प्रेम संबंध न हों तो जीवधारियों की सत्ता भी स्थिर न रह सकेगी। जरा कल्पना तो कीजिए, माता का बालक से प्रेम न हो, पति का पत्नी से प्रेम न हो, भाई से प्रेम न हो तो कुटुंब की कैसी दयनीय अवस्था हो जाए? यह भ्रातृ-भाव, स्नेह-संबंध नष्ट हो जाए तो सहयोग के आधार पर चलने वाली सारी सामाजिक व्यवस्था पूर्णतया नष्ट-भ्रष्ट हो जाए। सृष्टि का सारा सौंदर्य जाता रहे।

🔴 हर एक प्राणी हृदय में प्रेम की अजस्र धारा बह रही है। यदि हम सुख, शांति और संपदा पसंद करते हैं, तो आवश्यक है कि प्रेमभाव को अपनाएँ। दूसरों से उदारता, दया, मधुरता, भलमनसाहत और ईमानदारी का बरताव करें। जिन लोगों ने अपनी जीवन नीति प्रेममय बना रखी है, वे ईश्वरप्रदत्त मानवोचित आज्ञा का पालन करने वाले धर्मात्मा हैं। ऐसे लोगों के लिए हर घड़ी सतयुग है। चूँकि वे स्वयं सतयुगी हैं, इसलिए दूसरे भी उनके साथ सतयुगी आचरण करने को विवश होते हैं।

🌹 -अखण्ड ज्योति, फरवरी 1944


👉 The Only Source of Inner Joy

🔴 God has set a marvelous interdependence within and between the conscious and the inanimate components of Nature in order to maintain the eternal beauty and harmonious functioning of His grand creation. The uncountable numbers of stars and planets revolving in the limitless Universe are mutually connected by
natural forces of attraction. Any break in this connectivity would disturb the maintained equilibrium and stability and result in gigantic collision and devastation of the universal system.

🔵 The same is true of the mutual affinity of the living beings. Just imagine! If a mother does not have a feeling of love or affection for her child, or there is no binding of love between husband and wife, brother and brother, and other family members, then what will be the state of family institution? Lack of the feelings of affectionate caring, amity, cooperation, etc would ruin the entire social system as the letter is founded on these sentiments and consequent unity of its members. Dry-hearts and cruelty would destroy the sense of beauty from Nature…

🔴 A sublime spring of pure love is flowing deep within every heart. If we like to be happy, and prosper in an ambience of peace, we will have to awaken the feeling of love in our heart; this should not be an emotional excitement, rather, a feeling of compassion, generosity, honesty, humility, sensitivity, care and respect for others. Those who adopted this divine attitude on every front of their life are truly religious and followers of God. The world reciprocates to them accordingly. Every moment, every circumstance is auspicious for them.

-Akhand Jyoti, Feb. 1944

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