बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

👉 "पागलपन"

एक छोटे से सम्राज्य मे एक राजा राज करता था, और प्रजा भी ज्यादातर खुश थी, एक देख राजा के पडोसी देश और उनके शुभचिन्तक जलने लगे थे!

पडोसी देश के राजाओ ने उस राजा को बर्वाद करने के लिए एक जादूगर को वह राज्य देने की पेस कस कर दी, ताकतवर जादूगर ने उस शहर को तबाह कर देने की नीयत से वहां के कुँए में कोई जादुई रसायन डाल दिया।

जिसने भी उस कुँए का पानी पिया वह पागल हो गया।

क्योकि वह मुख्य कुआं था और सारा शहर उसी कुँए से पानी लेता था।

अगली सुबह उस कुँए का पानी पीने वाले सारे लोग अपने होशहवास खो बैठे।
शहर के राजा और उसके परिजनों ने उस कुँए का पानी नहीं पिया था क्योंकि उनके महल में उनका निजी कुआं था जिसमें जादूगर अपना रसायन नहीं मिला पाया था।

राजा ने अपनी जनता को सुधबुध में लाने के लिए कई फरमान जारी किये लेकिन उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि सारे कामगारों और पुलिस वालों ने भी जनता कुँए का पानी पिया था और सभी को यह लगा कि राजा बहक गया है और ऊलजलूल फरमान जारी कर रहा है।

सभी राजा के महल तक गए और उन्होंने राजा से गद्दी छोड़ देने के लिए कहा।
राजा उन सबको समझाने-बुझाने के लिए महल से बाहर आ रहा था तब रानी ने उससे कहा – “क्यों न हम भी जनता कुँए का पानी पी लें! हम भी फिर उन्हीं जैसे हो जायेंगे।”

राजा और रानी ने भी जनता कुँए का पानी पी लिया और वे भी अपने नागरिकों की तरह बौरा गए और बे सिर पैर की हरकतें करने लगे।

अपने राजा को ‘बुद्धिमानीपूर्ण’ व्यवहार करते देख सभी नागरिकों ने निर्णय किया कि राजा को हटाने का कोई औचित्य नहीं है. उन्होंने तय किया कि राजा को ही राजकाज चलाने दिया जाय।

मित्रों कहानी से तात्पर्य है कि अगर हजारों लोग हमारे विरुद्ध है तो हम गलत हो गए क्या, कभी - कभी ऐसी भी परिश्थितियाँ आ जाती है कि सिर्फ हम सही होते है और हजारों गलत,
इसलिए

अगर आप सही है तो सिर्फ अपने आप पर विश्वास रखिये, लोगों का क्या है उनका तो काम है कहना

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