मंगलवार, 4 अक्तूबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 5 Oct 2016


🔴 मानव जीवन उन्नति और प्रगति का अवसर है। इसका उपयोग कर मनुष्य किसी भी दिशा में कितनी ही उन्नति कर सकता है, किन्तु इस उन्नति का आधार एकमात्र श्रम और पुरुषार्थ ही है। ऐसा पुरुषार्थ जो कर्मयोग के भाव से प्रेरित और तपश्चर्या की गरिमा से किया जाय। ऐसा श्रम आनंददायक, सफलतादायक और पुण्यदायक भी होता है।

🔵 भाग्यवादी ऐसे पंगु की तरह हैं, जो अपने पाँवों पर नहीं, दूसरों के कंधों पर चलते हैं। जब तक दूसरे बुद्धिमान् व्यक्ति उसे उठाये रहते हैं, तब तक तो वह किसी प्रकार चलता रहता है। दूसरों का आधार हटते ही वह गिरकर नष्ट हो जाता है। उन्नति करने के लिए, संघर्ष के लिए उसमें न पुरुषार्थ होता है, न समुचित उल्लास और न अध्यवसाय।

🔴 जो लोग अध्यात्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ, कथा-वार्ता, उपवास-व्रत, तीर्थयात्रा, कर्मकाण्ड आदि को समझते हैं, वे गलती पर हैं। ये बातें अध्यात्म भावना उत्पन्न करने में सहायक हो सकती हैं, पर इनको स्वयं अध्यात्म नहीं कहा जा सकता। अध्यात्म तो तभी समझा जा सकता है, जब मनुष्य में ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की मनोवृत्ति उत्पन्न हो जाए और वह तद्नुसार व्यवहार करने लगे।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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