शनिवार, 29 अक्तूबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 30 Oct 2016

🔴 दैन्य न तो बाहरी साधनों और भौतिक संपत्ति की विपुलता से हटाया जा सकता है और न ही उसका रोना रोते रहने से। दारिद्रय घर में नहीं, मन में रहता है। विपुल संपत्ति रहते हुए भी धन लिप्सा के उचित-अनुचित का ध्यान न रखकर रुपये-पैसों का अम्बार लगाने के लिए दौड़ते रहने वालों को क्या संपन्न कहा जाएगा। अध्यात्म की भाषा में वे उसी स्तर के दीन हैं, जिस स्तर के साधनहीन रोते-कलपते रहने वाले लोग।

🔵 ईर्ष्या की उत्पत्ति दूसरों की उन्नति देखकर होती है और होती केवल उन्हीं व्यक्तियों को है, जो अक्षम, अदक्ष और अशक्त होते हैं। वे स्वयं तो कोई उन्नति करने योग्य होते नहीं और न अपनी मानसिक निर्बलता के कारण प्रयत्न ही करते हैं, लेकिन औरों का अभ्युदय देखकर जलने अवश्य लगते हैं, किन्तु इससे किसी का क्या बनता-बिगड़ता है। केवल अपने हृदय में एक ऐसी आग लग जाती है, जो गीली लकड़ी की तरह जीवन को दिन-रात झुलसाती रहती है।

🔴 पुरुषार्थ में विश्वास रखने वाले सच्चे कर्मवीर जीवन में कभी असफल अथवा परास्त नहीं होते। उनकी पराजय तो तब ही कही जा सकती है जब वे एक बार की असफलता से निराश होकर निष्क्रिय हो जायें और प्रयत्नों के प्रति उदासीन होकर हथियार डाल दें।

🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न...