गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 14 Oct 2016

🔵 विवाहों को मँहगा बनाना अपनी बच्चियों के जीवन विकास पर कुठाराघात करना है। जिन्हें अपनी या दूसरों की बच्चियों के प्रति मोह-ममता न हो, जिन्हें इस दो दिन की धूमधाम की तुलना में नारी जाति की बर्बादी उपेक्षणीय लगती हो, वे ही विवाहोन्माद का समर्थन कर सकते हैं। जब तक विवाह को भी नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत की तरह एक बहुत ही सरल, स्वाभाविक, सादा और कम खर्च का न बनाया जाएगा तब तक नारी जाति की उन्नति और सुख-शान्ति की आशा दुराशा मात्र ही रहेगी।

🔴 पूर्णतः पाक साफ, दूध का धुला हुआ कोई नहीं होता। भूलें, बुराइयाँ, पाप हो जाना मनुष्य की स्वाभाविक कमजोरी है। प्रत्येक मनुष्य पैदा होने से मरने तक कोई न कोई बुरा काम कर ही बैठता है। गिरकर उठने में, बुराई से भलाई की ओर आगे बढ़ने में ही मनुष्य की श्रेष्ठता है।

🔵 जिन्दगी को ठीक तरह जीने के लिए एक ऐसे साथी की आवश्यकता रहती है जो पूरे रास्ते हमारे साथ रहे, रास्ता बतावे, प्यार करे, सलाह दे और सहायता की शक्ति तथा भावना दोनों से ही संपन्न हो। ऐसा साथी मिल जाने पर जिन्दगी की लम्बी मंजिल बड़ी हँसी-खुशी और सुविधा के साथ पूरी हो जाती है। ऐसे सबसे उपयुक्त साथी जो निरन्तर मित्र, सखा, सेवक, गुरु, सहायक की तरह हर घड़ी प्रस्तुत रहे और बदले में कुछ भी प्रत्युपकार न माँगे, केवल एक ईश्वर ही हो सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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