सोमवार, 10 अक्तूबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 10 Oct 2016

🔵 आखिर हम स्वयं क्या हैं और अपनी आँखें अपने को किस नजर से देखती हैं? आत्मा की अदालत में इन्साफ की तराजू पर तोले जायँ तो हमारा पलड़ा बुराई की ओर झुकता है या भलाई की ओर। यदि हम अपनी कसौटी पर खरे उतरते हैं तो गुमराह लोग जो भी चाहे कहते रहें हमें इसकी जरा भी परवाह नहीं करनी चाहिए, किन्तु यदि अपनी आत्मा के सामने हम खोटे सिद्ध होते हैं तो सारी दुनिया के प्रशंसा करते रहने पर भी संतोष नहीं करना चाहिए।

🔴 प्रशंसा का सबसे बड़ा कदम यह है कि आदमी अपनी समीक्षा करना सीखे, अपनी गलतियों को समझे-स्वीकार करे और अगला कदम यह उठाये कि अपने को सुधारने के लिए अपनी बुरी आदतों से लड़े और उन्हें हटाकर रहे। जिसने इतनी हिम्मत इकट्ठी कर ली, वह एक दिन इतना नेक बन जाएगा कि अपने आप अपनी भरपूर प्रशंसा की जा सके। यह प्रशंसा ही सच्ची प्रशंसा कही जा सकेगी।

🔵 बुराई मनुष्य के बुरे कर्मों की नहीं, वरन् बुरे विचारों की देन होती है। इसलिए वह एक बार में ही समाप्त नहीं हो जाती, वरन् स्वभाव और संस्कार का अंग बन जाती है। ऐसी स्थिति में बुराई भी भलाई जान पड़ने लगती है। इसलिए बुरे कामों से बचने के लिए सर्वप्रथम बुरे विचारों से बचना चाहिए। दुष्कर्म का फल तुरन्त भोगकर उसे शान्त किया जा सकता है, पर संस्कार बहुत काल तक नष्ट नहीं होते। वह जन्म-जन्मांतरों तक साथ-साथ चलते और कष्ट देते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बूढ़ा पिता

🔷 किसी गाँव में एक बूढ़ा व्यक्ति अपने बेटे और बहु के साथ रहता था। परिवार सुखी संपन्न था किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी । बूढ़ा बाप ज...