बुधवार, 7 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 34)

🔵 संसार के दु:ख सीधे इच्छाओं के अनुपात में ही है। इसलिए अंध आसक्ति न रखो। स्वयं को किसी से बाँध न लो। परिग्रह की इच्छा न करो वरन् स्वयं में अवस्थित होने की दृढ़ इच्छा करो। क्या कोई भी संग्रह तुम्हारे सत्यस्वरूप को संतुष्ट कर सकेगा ? क्या तुम वस्तुओं से बद्ध हो जाओगे? नग्न हो इस संसार में तुम आते हो तथा जब मृत्यु का बुलावा आता है तब नग्न ही -चेले जाते हो। तब फिर तुम किस बात का मिथ्या अभिमान करते हो? उन वस्तुओं का संग्रह करो जिनका कभी नाश नहीं होता। अन्तर्दृष्टि का विकास अपने आप में एक उपलब्धि है। अपने चरित्र को तुम जितना अधिक पूर्ण करोगे उतना ही अधिक तुम उन शाश्वत वस्तुओं का संग्रह कर पाओगे जिनके द्वारा यथासमय तुम आत्मा के राज्य के अधिकारी हो जाओगे।

🔵 अत: जाओ इसी क्षण से आंतरिक विकास में लगो, बाह्य नहीं। अनुभूति के क्रम को अन्तर्मुखी करो। इन्द्रियासक्त जीवन से विरत होओ। प्रत्येक वस्तु का आध्यात्मीकरण करो। शरीर को आत्मा का मंदिर बना लो तथा आत्मा को दिन दिन अधिकाधिक अभिव्यक्त होने दो। और तब अज्ञानरूपी अंधकार धीरे धीरे दूर हो जायेगा तथा आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाश धीरे धीरे फैल उठेगा। यदि तुम सत्य का सामना करो तो विश्व की सभी शक्तियाँ तुम्हारे पीछे रहेंगी तथा समन्वित रूप से तुम्हारी उन्नति के लिए कार्य करेंगी। जैसा कि भगवान बुद्ध ने कहा, 'तथागतगण केवल महान शिक्षक हैं प्रयत्न तो तुम्हें स्वयं करना होगा'।
शिक्षक केवल ज्ञान दे सकते हैं। शिष्य को उसे आत्मसात् करना होगा और इस आत्मसात् करने का तात्पर्य है चरित्र निर्माण। ज्ञान को अपना बना लेना। स्वयं अपने द्वारा ही अपना उद्धार होना है दूसरे किसी के द्वारा नहीं।

🔴 उपनिषदों का आदेश है, 'उठो, सचेष्ट हो जाओ! और जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो तब तक न रुको!!'

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

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