सोमवार, 26 सितंबर 2016

👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 26 Sep 2016

🔴 ईमानदारी के साथ सद्दुदेश्य लेकर मनोयोगपूर्वक श्रम किया जाय, यह कर्त्तव्य है।  कर्म करने के उपरान्त जो प्रतिफल सामने आये उससे प्रसन्न रहने का नाम संतोष है। संतोष का यह अर्थ नहीं है कि जो है उसी को पर्याप्त मान लिया जाय, अधिक प्रगति एवं सफलता के लिए प्रयत्न ही न किया जाय। ऐसा संतोष तो अकर्मण्यता का पर्यायवाचक हो जाएगा।

🔵 दृढ़ता से रहित विनम्रता नैतिक अंतर्द्वन्द्व का कारण बनती है। सही, खरी, उचित और सामान्य बात भी किसी से इस भय से न कही जाय कि कहीं उसके अहं को चोट न पहुँच जाए, कहीं वह भड़क न उठे या कि रुष्ट न हो जाए तो यह विनम्रता नहीं। भले ही इस विनम्रता के पीछे दब्बूपन न हो, पर सामाजिक नैतिकता की उपेक्षा तो है ही। अनौचित्य के विरुद्ध दृढ़ता आवश्यक है। यहाँ विनम्रता का प्रदर्शन या तो कायरता होती है या मूर्खता। कायरता पूर्ण विनम्रता का तात्पर्य है दब्बूपन और धूर्ततापूर्ण विनम्रता का अर्थ है अनैतिक जीवन।

🔴 सभ्यता का मुख्य चिह्न शिष्टाचार को माना गया है, किन्तु आज लोगों ने शिष्टाचार को शिक्षा, वस्त्रों तथा बाहरी दिखावे तक ही सीमित कर दिया है। वस्तुतः शिष्टाचार का मुख्य तत्त्व मनुष्य के हृदय में रहने वाले स्नेह, सौहार्द्र, श्रद्धा एवं सद्भावना में निहित रहता है। भारतीय मान्यता के अनुसार अंदर से शून्य रहकर बाहर से विनम्र, विनीत किन्तु अश्रद्धालु रहकर स्नेह-स्वागत, सद्भावना, सौहार्द्र अथवा आवभगत का ढंग प्र्रदर्शित करना अशिष्टाचार ही माना गया है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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