सोमवार, 19 सितंबर 2016

👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 20 Sep 2016


🔴 भौतिक असंतोष एक प्रकार से मद्यपान की तरह है। उसकी उग्रता मनुष्य को इतना अधीर बना देती है कि उचित-अनुचित का भेद किये बिना वह कुछ भी करने पर उतारू हो जाता है। इस आवेग में जिन्हें लक्ष्य की पूर्णतया विस्मृति हो जाती है, ऐषणाओं की ललक मनुष्य को एक प्रकार से मदान्ध बना देती है। होती तो उससे भी  प्रगति है, पर वह परिणामतः अवगति से भी मँहगी पड़ती है। अस्तु, भौतिक असंतोष को हेय और आत्मिक असंतोष को सराहनीय माना गया है। सुख पाने के लालच में संतोष को गँवा बैठना अदूरदर्शितापूर्ण है।

🔵 आशावादी दृष्टिकोण एक दैवी वरदान है। आशा पर पाँव रखकर ही मनुष्य अपने जीवन का सारा ताना-बाना बुनता है। आशा ही सुखी रखती है, आशा ही संतुष्ट बनाती है, आशा ही जीवन है। उसे त्यागकर निराशा की मृत्यु का वरण हम क्यों करें? जितने दिन जीना है उतने दिन उत्साहपूर्वक जियें, मन और आत्मा को उन्मुक्त रखकर जियें। हमें सदैव इस बात पर भरोसा होना चाहिए कि हम आज की अपेक्षा कल निश्चित रूप से आगे बढ़े हुए होंगे-ऊँचे चढ़े होंगे।

🔴 संतोष आंतरिक और आत्मिक होता है। यह आदर्शवादी कर्तव्य-निष्ठा के अतिरिक्त और किसी माध्यम से उपलब्ध नहीं हो सकता। उत्कृष्ट चिंतन और आचरण के पीछे कर्त्तव्यपालन की आस्था काम करती है। इस आस्था को व्यवहार में परिणत होने का जितना ही अवसर मिलता है, उतना ही संतोष होता है। मानवतावादी, सज्जनोचित, अनुकरणीय चरित्र निष्ठा जिस अनुपात से फलवती होती है, उसी अनुपात से संतोष मिलता है।






🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है! 🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्म...