सोमवार, 19 सितंबर 2016

👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 22 Sep 2016

🔴 उच्च स्तरीय आदर्शों को प्राप्त करने के लिए मन को नियोजित कर सकना और उसे बलपूर्वक अभीष्ट लक्ष्य में प्रवृत्त किये रहना प्रौढ़ चेतना का ही काम है। उसी में यह सामर्थ्य है कि इन्द्रियों को विलासी लिप्सा से विरत रहने को फौजी आदेश देने और उनका पालन कराने में सफल हो सके। आलस्य शरीर की जड़ता और प्रमाद मन की जड़ता है। इसे उलटकर चित्त शक्ति का अनुशासन स्थापित करना आंतरिक प्रगल्भता के अतिरिक्त और किसी आधार पर संभव नहीं हो सकता।

🔵 प्रोत्साहन अपने आप में एक चमत्कार होता है। प्रशंसा और प्रोत्साहन से मनुष्य अपनी शक्ति और सामर्थ्य से कई गुना काम कर जाता है। प्रोत्साहन और प्रशंसा वह जादू की छड़ी है जिसको छूकर साधारण बंदर महावीर बन जाता है। नास्तिक छात्र नरेन्द्र, स्वामी विवेकानंद हो जाता है। कृष्ण के प्रोत्साहन से साधारण ग्वाल-बालों ने गिरि-गोवर्धन उठाने में सहयोग दिया। हम भी बिना एक पैसा खर्च किए दूसरों का भारी उपकार करने का यह गुण अपने में विकसित करके परमार्थ का पुण्य प्राप्त करते रह सकते हैं।

🔴 आज सभ्यता के प्रति अनास्था उत्पन्न हो रही है। अवज्ञा और उच्छृंखलता को शौर्य, साहस एवं प्रगतिशीलता का चिह्न माना जाने लगा है। नैतिक मर्यादाएँ उपहासास्पद और सामाजिक मर्यादाएँ अव्यावहारिक कही जाने लगी ंहंै। फलतः उद्धत आचरण और विकृत चिंतन के प्रति रोष प्रकट करने के स्थान पर उन्हें सहन करने तथा कभी-कभी तो प्रोत्साहन करने तक की प्रवृत्ति देखी जाती है। यह सब थोड़ी ही मात्रा में क्यों न हो, है भयंकर।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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