सोमवार, 19 सितंबर 2016

👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 23 Sep 2016

🔴 महामानव ही किसी युग के समाज की वास्तविक सम्पदा होते हैं। उनकी उदारता एवं चरित्र निष्ठा से प्रभावित होकर लोग अनुकरण के लिए तैयार होते हैं। श्रेष्ठता का संतुलन उन्हीं के प्रयासों से बना रहता है। उत्कृष्ट एवं उदात्त संवेदनाओं को अपनाकर ही कोई महामानव बन पाता है। इसके बिना कितनी ही बुद्धिमत्ता एवं सम्पदा रहने पर भी मनुष्य स्वार्थ परायण ही बना रहता है। उसकी क्षमता निज के छोटे दायरे में ही अवरुद्ध बनी पड़ी रहती है और रुके हुए जोहड़ के सड़े पानी की तरह दुर्गन्ध फैलाती है।

🔵 प्रमादी अधिक घाटे में रहते हैं। शरीर कोल्हू के बैल की तरह चलता रहता है, पर वह सब बेगार भुगतने एवं भार ढोने की तरह होता है। फलतः कर्म कौशल के उत्साह भरे आलोक की झाँकी नहीं मिलती। किसी कार्य को पूरे मनोयोग के-उमंग और उत्साह के साथ न किया जाय तो उसमें विद्रूप, अधूरापन ही परिलक्षित होता रहेगा। ऐसे कर्मों को कुकर्म तो नहीं, पर अकर्म अवश्य ही कहा जाएगा। वे काने, कुबड़े, लँगड़े, लूले और कुरूप होते हैं, उनसे कर्त्ता को श्रेय प्राप्त होना तो दूर, उलटे उपहासास्पद बनना पड़ता है।

🔴 जिस भी कार्य में, जिस भी दिशा में प्रवीणता प्राप्त करनी हो  उसका उत्साह एवं तत्परतापूर्वक दैनिक अभ्यास करना नितान्त आवश्यक है। किसी बात को सुन-समझ भर लेने से कोई काम नहीं बनता। प्रवीणता तब आती है, जब उन कार्यों को दैनिक अभ्यास में प्रमुखता दी जाय और उन्हें लम्बे समय तक लगातार जारी रखा जाय।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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