सोमवार, 19 सितंबर 2016

👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 24 Sep 2016


🔴 गृहस्थाश्रम विषय भोग की सामग्री नहीं, स्वार्थमयी लालसा और पापमयी वासना का विलास मंदिर नहीं, वरन् दो आत्माओं के पारस्परिक सहवास द्वारा शुद्ध आत्म-सुख, प्रेम और पुण्य का पवित्र प्रासाद है। वात्सल्य और त्याग की लीलाभूमि है। निर्वाण प्राप्ति के लिए शान्ति कुटीर है।

🔵 भोगवादी दृष्टिकोण वाले समाज में सांस्कृतिक गतिविधियों का अर्थ भी नाच-गाने, कामोत्तेजना और सस्ते मनोरंजन तक सिमट कर रह गया है, किन्तु वास्तविक सांस्कृतिक गतिविधि वह है जो व्यक्ति को सांस्कृतिक चेतना से संपन्न, सुसंस्कारित बनाए। उसमें सिद्धान्तों, विचारों की समझ पैदा करे और सही दृष्टि दे। जब तक व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने की ओर ध्यान नहीं दिया जाएगा, उसकी भौतिक वृत्तियों को ही प्रधानता देकर उभारा-उछाला जाता रहेगा तब तक समाज में पशु प्रवृत्तियों का प्राधान्य भी बना ही रहेगा।

🔴 हमें अपना, अपने बच्चों का, अपने समाज का पौरुष नष्ट होने से बचाना अभीष्ट हो तो कामुकता की प्रवृत्तियों से बचाव करना भी आवश्यक है। इनके द्वारा जो हानि हमारी हो सकती है उन पर बार-बार विचार करें, उसके खतरे से जनसाधारण को सचेत करें और यह प्रतिज्ञा करें-करावें कि हम अपने व्यक्तिगत जीवन में कामुक प्रवृत्तियों से दूर रहकर नारी मात्र के प्रति परम पवित्र भावनाएँ रखेंगे। अश्लीलता के नरक से बचकर संयमशीलता के स्वर्ग की ओर कदम बढ़ाना हम सबके लिए नितान्त आवश्यक है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बूढ़ा पिता

🔷 किसी गाँव में एक बूढ़ा व्यक्ति अपने बेटे और बहु के साथ रहता था। परिवार सुखी संपन्न था किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी । बूढ़ा बाप ज...