रविवार, 11 सितंबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 Sep 2016


🔴 आत्मा की दृष्टि से संसार के संपूर्ण प्राणी एक समान हैं। शरीर, धन, मान, पद और प्रतिष्ठा की बहुरूपता आत्मगत नहीं होती है। इस दृष्टि से ऊँच, नीच, वर्णभेद, छोटे-बड़े अशक्त, बलवान्, धनी या निर्धन का कोई भेदभाव नहीं उठता। परमात्मा के दरबार में सब एक समान हैं। कोई ऊँच-नीच, बड़ा, राजा या फकीर नहीं है। जो यह समझकर सबके साथ सदैव सद्भावनाएँ रखता है, वही सच्चा अध्यात्मवादी है।

🔵 मानव जीवन की सार्थकता के लिए विचार पवित्रता अनिवार्य है। केवल ज्ञान, भक्ति और पूजा से मनुष्य का विकास एवं उत्थान नहीं हो सकता। जिसके विचार गंदे होते हैं, उससे सभी घृणा करते हैं। शरीर गंदा रहे तो स्वस्थ रहना जिस प्रकार कठिन हो जाता है, उसी प्रकार मानसिक पवित्रता के अभाव में सज्जनता, प्रेम और सद्व्यवहार के भाव नहीं उठ सकते। आचार-विचार की पवित्रता से ही व्यक्ति का सम्मान व प्रतिष्ठा होती है।

🔴 बुराई पहले आदमी से अज्ञानी व्यक्ति के समान मिलती है और हाथ बाँधकर नौकर की तरह उसके सामने खड़ी हो जाती है, फिर मित्र बन जाती है और निकट आ जाती है। इसके बाद मालिक बनती है और आदमी के सिर पर सवार होकर उसे सदा के लिए अपना दास बना लेती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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