शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

👉 तुम ईश्वर को पूजते हो या शैतान को

🔴 मनुष्य, शरीर को `मैं’ समझता है। उसने एक जनश्रुति ऐसी अवश्य सुन रखी होती है कि आत्मा शरीर से भिन्न है, परंतु इस पर उसका विश्वास नहीं होता। हम सब शरीर को ही यदि आत्मा न मानते होते, तो यह भारतभूमि दुराचारों का केंद्र न बन गई होती। गीता में भगवान कृष्ण ने अपना उपदेश आरंभ करते हुए अर्जुन को यही दिव्य ज्ञान दिया है, ``तू देह नहीं है।’’ आत्मस्वरूप को जिस प्रकार विस्मण कर दिया गया है, उसी प्रकार ईश्वर को भी दृष्टि से ओझल कर दिया गया है।

🔵 हमारे चारों ओर जो घोर अज्ञाननांधकार छाया हुआ है, उसके तम में कुछ और ही वस्तुएँ हमारे हाथ लगी हैं और उन्हें ईश्वर मान लिया है। रस्सी को साँप मान लेने का उदाहरण प्रसिद्ध है। रस्सी का स्वरूप कुछ-कुछ सर्प से मिलता जुलता है। अंधेरे के कारण ज्ञान ठीक प्रकार काम नहीं करता, फलस्वरूप भ्रम सच्चा मालूम होता है। रस्सी सर्प का प्रतिनिधित्व भली प्रकार करती है। इस गड़बड़ी के समय में ईश्वर के स्थान पर शैतान विराजमान हो गया है और उसी को हम लोग पूजते हैं। आत्मा पंच तत्त्वों से सूक्ष्म है। पंच तत्त्व के रसों को इन्हीं तत्त्वों से बना हुआ शरीर भोग सकता है।

🔴 आत्मा तक कडुआ मीठा कुछ नहीं पहुँचता। यह तो केवल इंद्रियों की तृप्ति-अतृप्ति को अपनी तृप्ति मानना भर है।

🌹 अखण्ड ज्योति- मई 1940

👉 Who Do You Worship – The Divine or the Devil?

🔵 Man misidentifies himself as the physical body. Although he has herd something like ‘he has a soul that is different from the body’ but does not quite believe it or is not even able to imagine it. If most of us were not living under this illusion about unity of the self with the living body, this land (India) of great rishis would not have become home to vast spread corruption and confusion. It was this sacred land where Lord Krishna had preached Bhagvad Gita to Arjuna and reminded him that he is not the body. As we have totally forgotten this fact and never bother to know about our own “self”, how could we know the
Omnipresent Self, the God?

🔴  We are living in a state of utter ignorance and darkness. Whatever suits our deluded convictions or convinces our selfish intellect, that has become the definition of God for us. It is like considering a rope to be a snake because of lack of light. Indeed the rope resembles the shape of a snake and both would look
alike if kept at a dark place. But, as we all know they are not the same. It is only our illusion because of which we might confuse one with the other. It is a pity that this is what we the ‘intelligent beings’ have done today by regarding the devil as the divine.

🔵 Its time we awaken and ponder over our reality. We should attempt to realize that – the soul is sublime; it is not perceivable by the body or the materialistic means.

🌹 -Akhand Jyoti, May 1940

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