बुधवार, 10 अगस्त 2016

👉 आत्मबोध का अभाव ही खिन्नता (अन्तिम भाग)


🔵 सम्बन्धी कुछ समय पूर्व ही तो मिले थे। इससे पूर्व वे भी किसी के कुटुम्बी सम्बन्धी थे। अब यदि उनमें से कोई बिछुड़ता है और किसी नये परिवार का सदस्य बनता है तो ऐसा क्या हुआ जो इससे पूर्व किसी के साथ घटित नहीं हुआ, या भविष्य में किसी के साथ घटित न होगा। मिलन की प्रसन्नता के साथ विछोह की खिन्नता का अटल नियम चला आ रहा है। उस भवितव्यता से हम बचे रहें, ऐसी आशा करना व्यर्थ है। जो व्यर्थ की चिन्तन करता है उसे अकारण खिन्नता ओढ़नी पड़ती है।

🔴 परिवर्तन इस संसार का नियम है। जो वस्तु कल एक की थी वह आज अपने हाथ आ गई। परसों उसे दूसरे के हाथ जाना है। यह भ्रमणशील विश्व व्यवस्था अपने नियम बदल दे और तुम्हारे लिए नियम बदल दे और तुम्हारे लिए स्थिर बन कर रहे। ऐसी आशा करना खिन्नता मोल लेना है जिसका कोई उपचार नहीं।

🔵 यदि परिवर्तन से− विछोह और वियोग के दुःख से बचना है तो उसका एक ही उपाय है− आत्मज्ञान। हम सदा से हैं सदा तक रहेंगे। वस्तुएँ न अपनी थीं न अपनी रहेंगी। प्राणियों से सम्बन्ध बनते और बिछुड़ते रहते हैं। यह आत्मज्ञान है। आत्मा के अनुरूप चिन्तन, चरित्र और व्यवहार का गठन−यही है। स्थायी प्रसन्नता का वह आधार जिससे परिवर्तनशील परिस्थितियाँ न खिन्नता उत्पन्न करती हैं और न किसी कारण प्रसन्नता में व्यवधान आता है। आत्मबोध के अभाव में ही हम रोते−कलपते हैं। इसे प्राप्त किया जा सके तो फिर सदा सर्वदा आनन्द ही आनन्द है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1985 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1985/March.26

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