शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

👉 मेहनत की कमाई


🔵 किसी नगर में एक नारायण नाम का एक अमीर साहूकार रहता था। उसके दो संतान थी जिनमे से एक बेटा और एक बेटी थी। बेटी की शादी हुए चार साल से अधिक हो गया था और वो अपने ससुराल में बहुत खुश थी। जबकि उसका बेटा राजू वैसे तो मुर्ख नहीं था लेकिन फिर भी गलत संगति और बाप की और बचपन में दिए अधिक लाड प्यार ने उस बिगाड़ दिया था।

🔴 अपनी मेहनत की कमाई को बेटे के द्वारा यूँ उड़ाते देखकर नारायण को चिंता हुई तो उस नगर में एक गृहस्थ विद्वान थे नारायण ने उनसे सलाह मांगने की सोची। खूब बाते हुए नारायण ने उन्हें पूरी बात बताई।

🔵 दूसरे दिन नारायण ने राजू को बुलाया और बोला कि बेटा आज शाम का खाना तुम्हे तभी मिलेगा जब तुम आज कुछ कमाकर लाओगे। सुनकर राजू को रोना आ गया उसे रोता देखकर राजू के माँ की ममता पिघल गयी सो उसने उसे एक रुपया दे दिया। शाम को जब नारायण ने उसे बुलाया और उस से पुछा तो उसने एक रुपया दिखना दिया कि मैं ये कमाकर लाया हूँ इस पर राजू के पिता ने उसे उस रूपये को कुँए में फेकने के लिए कहा उसने बिना किसी हिचकिचाहट के उसे कुँए में फेक दिया क्योंकि वो उसकी मेहनत का नहीं था। अब नारायण को अपनी पत्नी पर शक हुआ तो उसने अपनी पत्नी को उसके मायके भेज दिया। दुसरे दिन भी यही परीक्षा हुई तो राजू की बहन जो मायके आई हुई थी उसने उसे रुपया दे दिया और फिर पिछली शाम की तरह उसने बिना किसी झिझक के वो भी पिता के कहने पर कुए में फेक दिया। तो फिर से नारायण को लगा कि दाल में कुछ तो काला है उसने अपनी बेटी को उसके ससुराल वापिस भेज दिया।

🔴 अब तीसरी बार राजू का इम्तिहान होना था लेकिन इस बार उसकी मदद के लिए कोई नहीं था क्योंकि माँ और बहन तो जा चुके थे और दोस्तों ने भी कुछ मदद करने से मना कर दिया। दोपहर तक सोचने के बाद उसे शाम के खाने की चिंता सता रही थी और उसे लग रहा था कि अब तो मेहनत करके ही कुछ करना पड़ेगा और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। सो वो एक जगह गया और दो घंटे बोझा ढोने के बाद उसे एक रुपया नसीब हुआ। पसीने से भीगा हुआ वो एक रुपया लेकर घर पहुंचा उसे लगा अब तो उसके पिता उस पर तरस खायेंगे लेकिन नारायण ने आते ही उसे उसकी कमाई के बारे में पुछा राजू ने अपनी जेब में से कड़ी मेहनत एक रुपया निकाला पहले की भांति राजू को उसने पिता ने उस रूपये को कुँए में फेक आने के लिए कहा तो राजू छटपटाया।

🔵 राजू ने कहा ‘आज मेरा कितना पसीना बहा है बस इस एक रूपये को पाने के लिए मैं इसे नहीं फेंक सकता।’ जैसे ही ये शब्द उसके मुह से निकले उसे अपनी गलती का खुद ही अहसास हो गया। नारायण खुश हुआ कि उसके बेटे को अब मेहनत के  रूपये की कीमत पता चल गयी है।

4 टिप्‍पणियां:

  1. lovely... When I was kid..i was following You Nirmaan Yozna..can I hv pdf version of that? please manage.. if not possible, i can help Gaayatri Pariwaar in making such Databse.

    All dedicated to my MOm n Mata Ji n Guru Ji

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. I think here is no need of asking for help...If you are feeling happy to help AKHIL BHARTIYA GAYATRI PARIWAR then it is very good Opportunity for you to do something good I think...

      हटाएं

👉 महान कर्मयोगी स्वामी विवेकानन्द (भाग 2)

🔴 परमहंस देव के इहलीला संवरण करने के पश्चात् जब परिव्राजक बनकर उन्होंने देश भ्रमण किया तो मार्ग में अलवर, खेतड़ी, लिम्बडी, मैसूर, रामनद...