बुधवार, 3 अगस्त 2016

👉 बुद्धि का प्रयोग

🔵 एक बार एक छोटा बालक नदी पर स्नान करने चला गया। बदकिस्मती से वो गहरे पानी में चला गया और उसके पांव टिक नहीं पाए और वो बहने लगा। खुद को इस मुश्किल में पाकर वो मदद की गुहार लगाने लगा और बोला “बचाओ मैं डूब रहा हूँ।” संयोग से एक आदमी उधर से सड़क पर नदी के किनारे किनारे जा रहा था और उसने उस बालक को चिल्लाते सुना तो मदद के लिए दौड़ा चला आया।

🔴  बालक की जान संकट में देखकर उस व्यक्ति ने भी  उसे बचाने के लिए यत्न नहीं किया अपितु उसे फटकारने भी लगा कि मूर्ख तू गहरे पानी में उतरा ही क्यों था अब तू अपनी मूर्खता का दंड भोग अब  सहायता के लिए क्यों चिल्ला रहा है। तो बालक ने भय मिश्रित विनम्र भाव से कहा श्रीमान जी पहले मुझे बचा लीजिये उसके बाद आप चाहे जितना मुझे फटकार सकते है। लेकिन वह व्यक्ति उस बालक की अपेक्षा अधिक मूर्ख था उसने लगातार बालक को फटकारना जारी रखा और बालक उस तेज धार में बह गया।

🔵  ऐसा ही कुछ हमारे साथ हमारी निजी जिन्दगी में भी होता है अक्सर हम किसी दूसरे या हमारे अपनों को किसी काम के बिगड़ जाने पर दोषारोपण करते है जबकि उस समय वो व्यक्ति जो खुद अपराधबोध से ग्रस्त होता है उसे इस मुश्किल समय में हमारा साथ चाहिए होता है लेकिन हम भी इस कहानी के उस व्यक्ति की तरह साथ की जगह उसे वैचारिक रूप से प्रताड़ित करते है यही वजह है जिन्दगी में खुशिया संतुलन में नहीं होती।

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