शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 9) 5 AUG 2016 (In The Hours Of Meditation)


🔴 ध्यान -कमी घड़ियों में आत्मा ने स्वयं से कहा- मौन में ही शांति का निवास हैं। और शांति पाने के लिए तुम्हें बलवान होना आवश्यक है। त्याग की शक्तिशाली निस्तब्धता में जब इन्द्रियों का विक्षोभ डूब जाता है तब मौन आता है। इस  संसार- मरुभूमि में तुम पथिक हो। यहाँ न रुकना जिससे कि तुम- रास्ते में ही नष्ट न हो जाओ। अपने लिए सद्विचारों का कारवाँ बना ला तथा जीवन्त विश्वास  के जल की व्यवस्था कर लो। सभी मृगतृष्णाओं से सावधान रहो। लक्ष्य वहाँ नहीं है। बाह्य आकर्षणों से भ्रमित न होओ।

🔵 सभी त्याग कर उन पथों से जाओ जो तुम्हें स्वयं तुम्हारी अन्तर्दृष्टि के एकांत में ले जायेंगे। अनेकत्व के जाल में फँस कर उसका अनुसरण न करो। एकत्व के जिस लक्ष्य की ओर संतगण सबसे अलग और अकेले जाते हैं उसी पथ में तुम भी जाओ। वीर होने का साहस करो। प्रारंभिक प्रयत्नों में ही असत्य को जीतो। विचलित न होओ। पवित्रता में डूब जाओ। एक उन्मत्त छलांग में स्वयं को ईश्वरीय समुद्र में डूबो दो। दिव्यत्व ही लक्ष्य है। ओ महान् ज्योतिर्मय की किरण।  प्रकृति में तुम्हारे लिए और कोई वस्तु नहीं हो सकती। शीघ्रता करो जिससे कि तुम्हें पश्चाताप न करना पड़े। धार्मिक आंतरिकता और दृढ़ विश्वास के घोड़ों को पकड़ने।

🔴 यदि आवश्यक हो तो स्वयं को कुचल डालो। किसी भी वस्तु को तुम्हारे रास्ते में बाधक न होने दो। तुम्हारा भाग्य संयोग पर निर्भर नहीं है। निश्चय और आत्मशक्ति के साथ आगे बढ़ो क्योंकि तुम्हारा लक्ष्य सत्य है। वस्तुतः तुम स्वयं ही सत्य हो। मुक्त हो जाओ। मुक्त -हो जाओ। आत्मानुभूति की भाषा में बल के समान और कोई महत्त्वपूर्ण नहीं है। प्रारंभ में, अंत में, सदैव तुम बलवान बनो। स्वर्ग, नरक, देवता, राक्षस किसी से न डरते हुए आगे बढ़ो। तुम्हें कोई नहीं जीत सकेगा। ईश्वर स्वयं तुम्हारी सेवा करने को बाध्य हैं क्योंकि वह स्वयं तुम्हारे भीतर विराजमान है जिसके प्रति कि वह आकर्षित हैं। अत: एकत्व हो अति -उदार अन्तर्दृष्टि का दया सार है क्योंकि जो तुम्हारे भीतर है, जो तुम हो, वह ईश्वर है। वास्तव में तुम स्वयं ही दिव्य हो।

तत् त्वम् असि ! हरि ओम् तत् सत् !

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

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