सोमवार, 29 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 26) (In The Hours Of Meditation)


🔴 तब मैंने सुना वाणी मानो प्रार्थना के स्वर में कह रही है- हे इन्द्रिय और विचारों के निर्माता! जिसका तुमने निर्माण किया है उसे नष्ट कर दो। भय-, काग, आहार, निद्रा तथा उससे उठने वाले किचारों के पिंजरे में बद्ध मानो तुमने इच्छापूर्वक स्वयं को अज्ञान के घनत्व से ढक लिया ह है और स्वप्न देखे जा रहे हो। तुम्हारे स्वयं का अज्ञान ही तुम्हारा अभिशाप है। सभी स्वप्नों को भंग कर दो। सुख तथा दुःख की धारणाओं को नष्ट कर दो और तब देहात्म- बुद्धि की यह लौह अर्गला छिटक कर एक ओर गिर जायेगी। इसलिये हमारे सामने जो कार्य है वह विलक्षण है। माया का जाल मकड़ी के जाले के समान पतला है किन्तु वह वज्र के समान कठोर भी है।

🔵 हे जीव, स्वयं का उद्धार करो। इस घर को तुम्हीं ने बनाया है, तुम्हीं उसे तोड़ो और इस घर को तोड़ने की प्रक्रिया है आत्मसाक्षात्कार। यह एकत्व की दैवी चेतना से संबंधित है। क्या सूर्य, तारे, नहीं! आकाश स्वयं भी तुम्हारे स्वरूप को निगल सकेगा ? आत्मा का तुम्हारे साथ एकत्व है। अज्ञान से, अंधकार से, बाहर आ जाओ। हे जीव! यह अज्ञान तुम्हारा स्व- आवृत है। सुख से पीड़ा अच्छी है, आनंद से दु:ख अच्छा है, क्योंकि ये हमारे विचारों तथा बुद्धि को वह रूप देते हैं जो कि आत्म- साक्षात्कार का उपयुक्त साधन बन जाता है। भीषण के प्रेमी बनो। यद्यपि भीषण के दर्शन में तुम मृत्यु को देखोगे किन्तु तुम अमरत्व का भी दर्शन करोगे। जीवन अधिक से अधिक स्वप्न। परम तत्त्व तो जीवन के परे है। अन्त में सभी जगह एकत्व है! दिव्य सर्वव्यापी एकत्व ! रश्मियाँ भिन्न भिन्न हो सकती है किन्तु सूर्य वही एक है तथा सूर्य ही और रश्मि है रश्मि ही सूर्य है। तुम हो तथा अंधकार भी आलोक है।  

🔴 यह सुन कर मेरी आत्मा ध्यान और भी' गहन से गहनतर स्तर में पहुँच गई और मैं सचमुच जान गया कि किरण ही सूर्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

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