बुधवार, 24 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 22) (In The Hours Of Meditation)


🔴 मेरी आत्मा ने गुरुदेव से निवेदन किया- महाभाग, कितना अद्भुत है! वहाँ मृत्यु नहीं!

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और तब गुरुदेव ने कहा-वत्स! वहाँ वासनासंभूत जीवन भी नहीं है। क्योंकि लोग जिसके भूखे हैं वह संसार कीच ही तो है। दूषित वासनाओं में आनंद लेने वाले लोग कीचड़ में सने शरीर में आनंद से लोटने वाले बैल के समान ही तौ हैं उनके लिए यह पथ बहुत लम्बा है क्योंकि इच्छाओं के ताने बाने से बनी माया उनके पथ में आड़े आती है। तुम उसके परे जाओ। तुम्हारा समय आयेगा। ऊपर की ओर देखो। वहाँ अनन्त ज्योति है। ऊपर देखो और वह ज्योति तुम्हारे मन की अपारदर्शिता को अवश्य भेद जायेगी।

🔴 इन शब्दों को सुनकर मुझे स्मरण हो आया कि चैतन्य ही आत्मा का स्वरूप है तथा मुक्ति ही लक्ष्य है। और वह लक्ष्य यहाँ और अभी है, मरणोपरान्त नहीं, तथा जीवात्मा का भाग्य निश्चित है और वह है आत्म- साक्षात्कार, जहाँ समय मिट जाता है। जहाँ भौतिक और मर्त्य चेतना विलुप्त हो जाती है। जहाँ ज्योति जो कि जीवन है, सत्य है, शांति है, वह प्रकाशित होती हैं। जहाँ सभी स्वप्न समाप्त हो जाते हैं वासनायें असीम अनुभूति में विलीन हो जाती हैं। जो कि महत् विस्तार का क्षेत्र है। उस अनन्त की अनुभूति के लिए, समय का अवसान कर देने के लिए इन्द्रिय प्रभूत कल्पनाओं की समाप्ति के लिए अनंत की मुक्ति के लिए ही यह अनुभूति है।

हरि ओम् तत् सत्

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 हीरों से भरा खेत

🔶 हफीज अफ्रीका का एक किसान था। वह अपनी जिंदगी से खुश और संतुष्ट था। हफीज खुश इसलिए था कि वह संतुष्ट था। वह संतुष्ट इसलिए था क्योंकि वह ...