बुधवार, 10 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 14) (In The Hours Of Meditation)


🔴 और तब जीव गुरु की वाणी के उत्तर में कहता है- हे प्रभु, जगतसृष्टा! तुम्हारा स्वभाव अनन्त है। तुम सर्वत्र विराजमान हो। प्रभु इतनी कृपा करो यह धारणा दृढ़तापूर्वक मेरे मन में सदैव बनी रहे। त्रिभुवन में तुम्हें छोड़कर और कोई आशा नहीं है। मृत्यु तथा आतंक सभी जगह  है। सभी ओर दुःख तथा भ्रम है। मर्त्य जीवन का यही तो दृश्य  है। किन्तु तुम यदि भ्रम दूर कर दो तो जहाँ मृत्यु पीछा कर रही है, जहाँ दुःख है वहाँ भी मैं तुम्हारे दर्शन करूँगा। प्रभु, भयंकर में भी मैं तुम्हारे दर्शन करूँ ! हे भ्रम -विनाशक प्रभु, मेरी प्रार्थना सुनो।

और गुरु की वाणी ने उत्तर दिया:-

🔵 वत्स, प्रभु को पुकारो! सदैव प्रभु को पुकारो!! उनके और केवल उनके विषय में ही विचार करो और वह असीम शक्ति तुम्हारे चारों ओर एकत्र हो जायेगी तथा अनन्त प्रेम तुम्हारा आलिंगन करेगा। तथा प्रभु तुम्हारी आत्मा में अनुभव की वाणी बोलेंगे।

🔴 भगवान पर सच्ची निर्भरता सभी कठिनाइयों को दूर कर देती है। व्यक्ति- निर्माण की सच्ची प्रक्रिया परम प्रेम के प्रति पूर्ण समर्पण में है, यह अबाध ध्यान में प्रगट होती है। जब जीवन मिथ्या प्रतीत होता है, जब मृत्यु उपस्थित होती है, जब पीड़ा से हृदय ऐंठता है, तथा मनुष्य का संताप चूड़ान्त हो उठता है, तुम स्मरण रखने की चेष्टा करो, स्मरण रखो कि यह सब बातें शरीर की हैं; तुम आत्मा हो। प्रत्येक दिन को इस प्रकार ग्रहण करो मानो यह जीवन का अंतिम दिन है। जीवन के प्रत्येक क्षण में जप करो। प्रतिदिन अपना जीवन भगवान के चरणों में समर्पित कर दो। उनकी इच्छा की सर्वज्ञता को देखो, और तब बाघ के मुँह में भी, मृत्यु की उपस्थिति में भी, नरक द्वार में भी तुम ईश्वर को प्राप्त करोगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

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