सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

👉 भाग्य का निर्माण अपने हाथ में है।

🔵 अनेक बार छोटी-मोटी असफलता मिलने तथा अभाव ग्रस्त होने पर लोग ऐसा कहने लगते हैं-”क्या करें, हमारे भाग्य में ही ऐसा लिखा है, हमें ऐसी ही हीन स्थिति में रहना पड़ेगा। यदि हमारे भाग्य में सफलता बंधी होती तो अब तक के प्रयत्न असफल क्यों होते?” ऐसे अदूरदर्शी मनुष्य भाग्यवाद के गूढ़ सिद्धान्तों को नहीं समझते और न यह समझते हैं कि इस प्रकार की मान्यता बना लेने के कारण वे किस प्रकार अपने भविष्य के निर्माण में भारी बाधा उपस्थित कर रहे हैं। ऐसे लोग मार्ग की बाधाओं का मुकाबला नहीं कर सकते।

🔴 सफलता की देवी का प्रसन्न करने के लिए पुरुषार्थ की भेंट चढ़ानी पड़ती है। जो मनुष्य पुरुषार्थी नहीं है, प्रयत्न और परिश्रम में दृढ़ता नहीं रखता वह स्थायी सफलता का अधिकारी नहीं हो सकता। यदि अनायास किसी प्रकार कोई सम्पत्ति उसे प्राप्त हो भी जाय तो वह उससे संतोषजनक लाभ नहीं उठा सकता। वह ऐसे ही अनायास चली जाती है जैसे कि अनायास आई थी।

🔵 रोटी का स्वाद वह जानता है जिसने परिश्रम करने के पश्चात् क्षुधार्त होकर ग्रास तोड़ा हो। धन का उपयोग वह जानता है जिसने पसीना बहाकर कमाया हो। सफलता का मूल्याँकन वही कर सकता है जिसने अनेकों कठिनाइयों, बाधाओं और असफलताओं से संघर्ष किया हो। जो विपरीत परिस्थितियों और बाधाओं के बीच मुस्कराते रहना और हर असफलता के बाद दूने उत्साह से आगे बढ़ना जानता है। वस्तुतः वही विजयलक्ष्मी का अधिकारी होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949 पृष्ठ 30

👉 ईश्वर क्या है?

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