बुधवार, 12 जुलाई 2017

👉 स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। (भाग 1)

🔵 जितने सन्त तथा महापुरुष हुए हैं उन्होंने स्वाध्याय की महिमा का गान किया है। हिन्दू शास्त्रों में लिखा है कि ‘स्वाध्याय में प्रमाद नहीं करना चाहिए।’

🔴 स्वाध्याय के अर्थ के सम्बन्ध में लोगों में अनेक मतभेद हैं। कुछ लोग पुस्तकें पढ़ने को स्वाध्याय कहते हैं, कुछ लोग खास प्रकार की पुस्तकें पढ़ने को स्वाध्याय कहते हैं। कुछ का कहना है कि आत्म निरीक्षण करते हुए अपनी डायरी भरने का नाम स्वाध्याय है। वेद के अध्ययन का नाम भी कुछ लोगों ने स्वाध्याय रख छोड़ा है। लेकिन इतने अर्थों का विवाद उस समय अपने आप हो समाप्त हो जाता है जब मनुष्य के ज्ञान में उसका लक्ष्य समा जाता है।

स्वाध्याय का विश्लेषण करने वालों ने इसके दो प्रकार से समास किये हैं-

स्वस्यात्मनोऽध्ययनम्- अपना, अपनी आत्मा का अध्ययन, आत्मनिरीक्षण।
स्वयम्ध्ययनम्- अपने आप अध्ययन अर्थात् मनन।

दोनों प्रकार के विश्लेषणों में स्व का ही महत्व है।

🔵 प्रति घड़ी प्रत्येक मनुष्य को अपने स्वयं चरित्र का निरीक्षण करते रहना चाहिए कि उसका चरित्र पशुओं जैसा है अथवा सत्पुरुष जैसा। आत्मनिरीक्षण की इस प्रणाली का नाम ही स्वाध्याय है। जितने महापुरुष हुए हैं वे सब इसी मार्ग का अनुसरण करते रहे। उन्होंने स्वाध्याय के इस मार्ग से कहीं भी अपने अन्दर कमी नहीं आने दी बल्कि समस्त कमियों को निकालने और पूर्ण मानव बनने के उद्देश्य से इस मार्ग को ग्रहण किया।

🔴 पानी बहता है क्योंकि उसका बहना ही धर्म है। सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र चलते हैं। क्योंकि गति करना, चलना यह उनका स्वभाव है। यदि ये अपने स्वभाव को छोड़ दें, गति हीन हो जावें तो सृष्टि का काम ही रुक जावे। ऐसे ही मानव का स्वाभाविक काम स्वाध्याय है जिस दिन वह स्वाध्याय नहीं करता उसी दिन वह मानवत्व से पतित हो जाता है-

🔵 वेद शास्त्रों में श्रम का सब से बड़ा महत्व है। हर एक को कुछ न कुछ श्रम नित्य प्रति करना ही चाहिए। श्रम इसी त्रिलोकी में होता है। भू, भुवः और स्वर्ग लोक ही श्रम का क्षेत्र है। इस श्रम के क्षेत्र में स्वाध्याय ही सबसे बड़ा क्षेत्र है। योग भाष्यकार व्यास का कहना है कि :-

स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमामनेत्।
स्वाध्याय योगसम्पत्या परमात्मा प्रकाशते।1।28


🔴 अर्थात् स्वाध्याय द्वारा परमात्मा से योग करना सीखा जाता है और समत्व रूप योग से स्वाध्याय किया जाता है। योगपूर्वक स्वाध्याय से ही परमात्मा का साक्षात्कार हो सकता है।

🌹 श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1948 दिसम्बर पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/December/v1.3

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