गुरुवार, 3 नवंबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 67)

श्री गुरु देव ने कहा

🔵 कोई योजनायें न बनाओ! संसारी लोग ही योजनायें बनाते हैं। परिस्थितियों से स्वतंत्र रहो। अनिश्चय को ही अपना निश्चय बना लो। तथा सर्वथा संन्यास के व्रतों के अनुसार जीवनयापन करो। कल क्या होगा इसकी चिन्ता क्यों करते हो? वर्तमान जैसा आता है उसी में उच्च जीवन व्यतीत करो। भूत, भविष्य और वर्तमान के प्रत्येक अनुभव के साथ परम प्रेमास्पद का नाम युक्त करो। इस प्रकार तुम्हारी इच्छाओं का अध्यात्मीकरण होगा। जिस प्रकार तुम दीवार पर टँगे चित्र को देखते हो उसी प्रकार उन्हें देखो। उनकी विषयवस्तु दुखान्त, साधारण या मोहक हो सकती है किन्तु तुम उसे मात्र एक आलोचक की दृष्टि से देखो। वे भले बुरे जैसे भी हों यह जान रखो कि -तुम्हारे अंतःकरण में अवस्थित आत्मा सभी अनुभवों से सर्वथा पृथक है।

🔴 और जहाँ तक संगठनों का प्रश्न है उनकी उपयोगिता तथा जिस महान् आदर्श को वे प्रतिपादित करती हैं उनका महत्त्व स्वीकार कैसे किन्तु तुम स्वयं निर्लिप्त रहो। धार्मिक जीवन सर्वथा व्यक्तिगत स्वानुभवात्मक है। भले ही किसी प्रतिष्ठान में धार्मिक जीवन का आरंभ हो किन्तु उसे प्रतिष्ठान से ऊपर अवश्य उठना चाहिये। नियमों से हो कर नियमों के परे जाना ही अनुभूति का मार्ग है। यह जान कर मुक्त हो जाओ। जो कार्य आये उसे करो तथा उसके भीतर मुक्त रहो।

🔵 यदि संगठन करना ही है तो विचारों का संगठन करो किन्तु केवल संगठनात्मक रूप का विस्तार करने के लिये कभी परिश्रम न करो। कोई संगठन तुम्हारा उद्धार नहीं कर सकता, तुम्हें स्वयं अपना उद्धार करना होगा। साधारणतः संगठनों का उद्देश्य कितना भी धार्मिक तथा असाम्प्रदायिक क्यों न हो उनका ह्रास सांसारिकता में हो जाता है। साम्प्रदायिकता से सावधान रहो। रूढ़िवाद और कट्टरता से दूर रहो। सर्वसमन्वयी बनो।

🔴 अपने प्रेरणा स्रोत के प्रति सदैव सत्यनिष्ठ तथा निष्ठावान रहो। विश्वास और प्रेम रखो, आशा तथा धैर्य रखो। माया के परदे तुम्हारे लिये शीघ्र ही विदीर्ण हो जायेंगे तथा तुम अपने प्रेमास्पद को मेरे सत्य -स्वरूप में देख पाओगे। मेरे व्यक्तित्व या यों कहें मेरे व्यक्तित्व के संबंध में तुम्हारी अपनी धारणा में आबद्ध न होओ। मैं वह नहीं हूँ जो इस लोक में तुम्हारे व्यक्तित्व के समान एक व्यक्तित्व से मानवीय सीमाओं और दुर्बलताओं के साथ जुड़ा हुआ था। वह व्यक्तित्व तो मैंने धारण किया था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

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