मंगलवार, 22 नवंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 25)

🌹 अशिक्षा का अन्धकार दूर किया जाय

🔵 29. पुस्तकालय और वाचनालय— पुस्तकालयों और वाचनालयों की स्थापना की जाय। उनमें केवल ऐसी चुनी हुई पुस्तकें या पत्र पत्रिकाएं ही मंगाई जावें जो जीवन निर्माण की सही दिशा में प्रेरणा दे सकें। अश्लील, जासूसी, भद्दी भौंड़ी विचारधारा देने वाली या मनोरंजन मात्र का उद्देश्य पूरा करके समय नष्ट करने वाली, भ्रम उत्पन्न करने वाली चीजें संख्या की अधिकता के मोह में भूलकर भी इन पुस्तकालयों में जमा न की जांय। भोजन में जो स्थान विषाक्त खाद्य पदार्थों का है वही पुस्तकालयों में गन्दे साहित्य का है। इस शुद्धि का पूरा-पूरा ध्यान रखते हुए चुनी हुई पुस्तकों के वाचनालय, पुस्तकालय स्थापित किये जांय। उनका खर्च पढ़ने वालों से कुछ शुल्क लेकर या चन्दा से पूरा किया जाय। जिनके यहां अच्छी पुस्तकें जमा हैं या पत्र-पत्रिकाएं आती हैं उनसे वह वस्तुएं उधार भी मांगी जा सकती हैं और इस प्रकार प्रयत्न करने से भी पुस्तकालय वाचनालय चल सकते हैं। लोक शिक्षण के लिए इनकी भी बड़ी आवश्यकता है।

🔴 30. अध्ययन की रुचि जगावें—
पढ़ने की अभिरुचि उत्पन्न करना, युग-निर्माण की दृष्टि से एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है। आमतौर से स्कूली शिक्षा समाप्त करने के बाद लोग पुस्तकों को नमस्कार कर लेते हैं और अपने काम धन्धे को ही महत्व देते हैं। उनकी दृष्टि में पुस्तकें पत्रिकाएं आदि पढ़ना ताश खेलने की तरह समय को व्यर्थ गंवाने वाला मनोरंजन मात्र होता है। इस मान्यता को हटाया ही जाना चाहिये और निरक्षरता की भांति ‘‘ज्ञान-वृद्धि की उपेक्षा’’ से भी प्रबल संघर्ष आरम्भ करना चाहिये। जन-मानस में यह बात गहराई तक प्रवेश कराई जानी चाहिये कि पेट को रोटी देने की भांति बुद्धि को ज्ञान-वर्धक साहित्य की आवश्यकता है। उसकी उपेक्षा करने पर आन्तरिक विकास की समस्या हल नहीं हो सकती।

🔵 घर-घर जाकर पढ़ने में अभिरुचि उत्पन्न कराना, पुस्तकें पढ़ने का महत्व बताना और फिर उन्हीं से निवास स्थानों पर उपयोगी पुस्तकें पहुंचाना एक बहुत बड़ा काम है। चलते-फिरते पुस्तकालयों का यही रूप रहे कि ज्ञान प्रचारक लोग अपने झोले में कुछ पुस्तकें रखकर घर से निकला करें और जन-सम्पर्क बढ़ाकर जिनमें अभिरुचि उत्पन्न हो जाय उन्हें पुस्तकें पढ़ने देने तथा वापिस लेने जाया करें। चाय का प्रचार इसी प्रकार घर-घर जाकर मुफ्त में चाय पिलाकर प्रारम्भिक प्रचारकों ने किया था। अब तो चाय की आदत इतनी बढ़ गई है कि पीने वाले हड़बड़ाते फिरा करते हैं। इसी प्रकार की अभिरुचि सद्ज्ञान साहित्य पढ़ने और स्वाध्याय को नित्य नियमित रूप से करते रहने के लिए उत्पन्न हो सके ऐसा प्रयत्न किया जाना चाहिये। इस प्रवृत्ति की अभिवृद्धि पर युग-निर्माण योजना की सफलता बहुत कुछ निर्भर रहेगी।

🔴 शिक्षा प्रसार आवश्यक है। मानसिक उत्कर्ष के लिए यह एक अनिवार्य कार्य है। इसके बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता। विचार क्रान्ति के उद्देश्य की पूर्ति लोक शिक्षण पर ही निर्भर है और वह कार्य शिक्षा प्रसार से ही होगा। हमें इसके लिए जी जान से जुटना चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न...