गुरुवार, 23 सितंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ६६)

ज्ञान ही है भक्ति का साधन

इन सात्त्विक दृश्यावलियों के बीच गायत्री महामन्त्र के द्रष्टा महान् ऋषि विश्वामित्र ने कहा- ‘‘हे महर्षि आश्वालायन! आपकी प्रतिभा, विद्या, ज्ञान की कथाएँ ऋषियों के समूह में सादर कही-सुनी जाती हैं। आप अपने अनुभवों में घोलकर भक्ति एवं ज्ञान के सम्बन्ध का निरूपण करें।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के इस प्रस्ताव ने आश्वलायन ऋषि को असमंजस में डाल दिया। सम्भवतः वह इसके लिए तैयार नहीं थे। इसीलिए उन्होंने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ कहा भी, ‘‘मैं तो यहाँ आप सब महनीय जनों के संग के लिए आया हूँ, फिर इस भक्ति अमृत के मध्य मेरी वाणी कितनी उपयुक्त एवं सार्थक होगी।’’ आश्वलायन के इन स्वरों के साथ देवों एवं ऋषियों के अनुरोध के स्वर भी तीव्र हो उठे।
    
इस आग्रह को वे ठुकरा न सके और कहने लगे कि ‘‘मैं आप सभी के आदेशों को शिरोधार्य करके अपना अनुभव सत्य कहने का प्रत्यन कर रहा हूँ। परन्तु इसका निष्कर्ष तय करने की जिम्मेदारी आप सबकी है। मेरी ये अनुभूतियाँ तब की हैं, जबकि मैं युवावस्था को पारकर प्रौढ़ावस्था में प्रवेश कर रहा था। अपने अध्ययन के प्राथमिक चरण से ही मुझे सराहना मिली थी। आचार्यगण मुझे प्रतिभा एवं विद्या का पर्याय मानते थे। अनेकों किम्वदन्तियाँ मेरे बारे में प्रचारित हो रही थीं। युवावस्था आते तक मैंने सभी विद्याओं एवं कलाओं में निपुणता प्राप्त कर लीं परन्तु न जाने क्यों मन बेचैन रहता था। जब-तब एक बैचेनी मुझे घेर लेती थी। इसे हटाने के लिए मेरे सभी तर्क निष्फल थे। सारा शास्त्र ज्ञान अधूरा था।
    
आखिरकार मैं हिमालय आ गया। सोचा यही था कि हिमवान की शीतलता अवश्य मेरी आन्तरिक ऊष्णता का शमन करेगी। यहाँ आकर मैं यूँ ही सुमेरू की शृखंलाओं के बीच भ्रमण करने लगा। यहाँ भ्रमण करते हुए मुझे परम दीर्घजीवी देवों के भी पूज्य महर्षि लोमश मिले। उन्होंने मेरे सिर पर आशीष का हाथ रखा। उनका वह स्पर्श अतिअलौकिक था। इस स्पर्श ने मेरी सारी क्षुधा, तृषा, थकान व बेचैनी हर ली। एक विचित्र सी शीतल प्रफुल्लता की लहर मेरे अस्तित्त्व में प्रवाहित हो उठी और मेरे रोम-रोम पुलकित हो गये। इस एक क्षण के अनुभव में मेरे अतीत के सम्पूर्ण अनुभव धुल गए।
    
मेरी प्रतिभा व विद्या का दम्भ जाता रहा। मेरे वे नुकीले तर्क जो सदा औरों को आहत करते रहते थे, आज पिघल गए। मैं तो बस हिमशिखरों के मध्य खड़े कालजयी महर्षि लोमश को निहारता रह गया। मुझे तो यह भी सुधि नहीं रही कि मैं उनके पावन चरणों में माथा नवाऊँ पर उन करूणामय महर्षि ने मेरा हाथ थामा और मुझे एक ओर ले चले। थोड़ी दूर चलने के बाद एक गुफा आ गयी। यहाँ का वातावरण अति सुरम्य था। परम प्रशान्ति यहाँ छायी थी। इस गुफा के पास ही एक सुन्दर जल स्रोत था, जहाँ सुन्दर पक्षी जलक्रीड़ा कर रहे थे। आस-पास के स्थान में मखमली घास उगी थी। इस घास के बीच-बीच पर सुगन्ध बिखेरते पुष्पित पौधे लगे थे। इस वातावरण को मैं देर तक थकित-चकित देखता रह गया। उन क्षणों में मैं भावों से भरा था, और मेरे मुख से एक भी शब्द उच्चारित नहीं हो रहा था, पर महर्षि लोमश बड़े मधुर स्वरों से मुझे कह रहे थे- वत्स आश्वलायन! ज्ञान के दो रूप हैं- पहला है विवेक और दूसरा है बोध। जो ज्ञान इन दोनों रूपों से वंचित हो, उसे ज्ञान नहीं अज्ञान कहेंगे। कोरी बौद्धिकता से जानकारियों का बोध तो बढ़ता है, परन्तु इससे सत्य, सद्वस्तु की झलक नहीं मिलती। ज्ञान के अनुभव की प्रथम झलक विवेक के रूप में मिलती है। फिर वह अक्षरज्ञान से हो अथवा अक्षरातीत अवस्था में पहुँचकर।
    
यह विवेक हुआ तो वासनाएँ स्वयं ही भावनाओं में रूपान्तरित हो जाती हैं और अन्तःकरण में भक्ति अंकुरित होती है। प्रभु के स्मरण, उनमें समर्पण, विसर्जन से इस भक्ति का परिपाक होता है और तब ज्ञान का दूसरा रूप बोध के रूप में प्रकट होता है। इस अवस्था में मनुष्य को परात्पर तत्त्व का साक्षात्कार होता है। वह सत्य के झरोखे से ऋत् की झांकी देखता है। यह बुद्धि की सीमा से सर्वथा पार व परे है। यहाँ न तर्क है और अनुमान। यहाँ पर तो प्रभु की शाश्वतता का साकार व सम्पूर्ण बोध है। अपने इस कथन को पूरा कहने के पूर्व आश्वलायन की भावनाएँ बरबस आँखों से छलक पड़ीं। जिस-तिस तरह से वह स्वयं को संयत करते हुए बोले- मैं तो यही कह सकता हूँ कि भक्ति ज्ञान का सार है।’’ आश्वलायन के इस वचन को आत्मसात करते हुए देवर्षि नारद ने अपने सूत्र का सत्योच्चार किया-
‘तस्या ज्ञानमेव साधनमित्येके’॥ २८॥
    
‘‘उसका (भक्ति का) साधन ज्ञान ही है, किन्हीं (आचार्यों) का यह मत है।’’ इस सूत्र को सुनने के साथ सभी के मन मौन में डूब गए। सम्भवतः इस सत्य का कोई अन्य पहलू अवतीर्ण होने की प्रतीक्षा में रत था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ११७

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