शनिवार, 10 जून 2017

👉 शाश्वत और सर्वस्व की प्राप्ति है धर्म

🔴  किसी ने कहा, ‘‘धर्म त्याग है।’’ यह सुनकर सुनने वाले घबराए। उनकी घबराहट स्वाभाविक थी। आखिर उनमें से हर एक ने अपने जीवन में पल-पल तिनका-तिनका जोड़ा था। छोटी-छोटी चीजों को पाने के लिए न जाने कितने झगड़े-झंझट खड़े किए थे, कितनी पुरजोर मेहनत की थी। उन सबका त्याग!
 
🔵 उनकी इस सकपकाहट को एक फकीर बैठा देख रहा था। वह हँस पड़ा। लोगों ने उसकी हँसी का कारण पूछा। तो उसने कहा, कुछ नहीं, बस यूँ ही बचपन की एक घटना याद आ गई। बचपन में मैं कुछ लोगों के साथ नदी तट पर वनभोज को गया था। नदी तो छोटी थी, पर रेत बहुत थी और रेत में चमकीले रंगों भरे पत्थर बहुत थे। मैंने तो जैसे खजाना पा लिया था। साँझ तक इतने पत्थर बीन लिए कि उन्हें साथ ले जाना असंभव था। चलते क्षण जब उन्हें छोड़ना पड़ा, तो आँखें भीग गईं। साथ के लोगों की उन पत्थरों की ओर विरक्ति देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उस दिन वे मुझे बड़े त्यागी लगे थे, पर आज जब सोचता हूँ, तो समझ आता है कि पत्थरों को पत्थर जान लेने पर त्याग का कोई प्रश्न ही नहीं है। अज्ञान भोग है। ज्ञान त्याग है। त्याग क्रिया नहीं है। वह करना नहीं होता है। वह हो जाता है। वह ज्ञान का सहज परिणाम है। भोग भी यांत्रिक है। वह भी कोई करता नहीं। वह अज्ञान की सहज परिणति है।

 🔴  फिर त्याग के कठिन और कठोर होने की बात व्यर्थ है। उसके लिए घबराने-परेशान होने का भी कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि वह कोई क्रिया नहीं है। क्रियाएँ ही कठिन और कठोर मालूम पड़ती हैं। वह तो परिणाम है, फिर उसमें जो छूटता मालूम होता है, वह निर्मूल्य होता है और जो पाया जाता है, वह अमूल्य होता है।

 🔵 सच तो यह है कि हम केवल बंधनों को छोड़ते हैं और पाते हैं मुक्ति। छोड़ते हैं कौड़ियाँ और पाते हैं हीरे। छोड़ते हैं मृत्यु और पाते हैं अमृत। छोड़ते हैं अँधेरा और पा लेते हैं प्रकाश। छोड़ते हैं अपनी क्षुद्रता और पा लेते हैं शाश्वत और अनंत। छोड़ते हैं दुःखों को, पीड़ाओं को और पा लेते हैं असीम आनंद। इसलिए त्याग कहाँ है? न कुछ को छोड़कर सब कुछ को पा लेना त्याग नहीं है। शाश्वत और सर्वस्व की प्राप्ति है धर्म।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 88

2 टिप्‍पणियां:

  1. ॐ क्या है ?
    क्या जैसा कुछ विद्वानों और दार्शनिकों का मत है , कि ॐ सृष्टिकारक है ।
    इस अवधारणा को कितना सत्य माने ?
    और यदि ॐ ही सृष्टिकारक है , तो उसे किस रूप में माना जाए ?
    क्या नादरूप में , या ऊर्जा रूप में , या वायु रूप में ?
    क्योंकि यदि नाद रूप में माना जाए , तो नाद वायु के प्रभाव से उत्पन्न होगा ।
    और यदि ऊर्जा रूप में माना जाए , तो ऊर्जा नाद से उत्पन्न होगी ?
    और यदि वायु रूप में माना जाए तो वायु ऊर्जा से उत्पन्न होगी ?
    तो ॐ को किस रूप (सहज बुद्धि के अनुसार) में माना जाए ।
    साधक इसे अनाहत नाद या अनाहत ऊर्जा के रूप में मान सकते हैं ।
    परंतु आम जन को इसकी व्याख्या किस रूप में सहज होगी ?
    और सांसारिक जीवन यदि त्याग के लिए ही हुआ है , तो जीवन का औचित्य क्या है ?
    क्या केवल त्याग ? क्योंकि जीवन का रस तो पूरक होने में हैं । तो त्याग व विरक्ति ही क्यों ? यदि सृष्टि में अकिंचन से अकिंचन जीव भी त्याग और विरक्ति की भावना से भर जाए , तो फिर इस प्रकृति का सौंदर्य क्या रहा ? माया का अस्तित्व तो इससे स्वतः समाप्त हो गया । क्या मानव गुण धर्म ये नही कि अपना सीखा आगे बांटा जाए । और क्या मानव का मूल धर्म सृजन नही है ? यदि नही तो जीवन तो अमीबा बन के भी जिया जा सकता है । रचना का क्या महत्व फिर ? रचियता का क्या औचित्य ?
    संसार का प्राकृतिक मार्ग क्या ये नही कि क्रियाशील रहते हुए , हम स्वयं को और अधिक समृद्ध बनाएं , ताकि रचनाओं में निरंतरता आ सके ?
    कर्म प्रधान या त्याग ?
    कृपया शंका दूर करें ..

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