गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

👉 जप में ध्यान द्वारा प्राणप्रतिष्ठा (भाग 2)

🌹 जप के साथ ध्यान का अनन्य संबंध है। नाम और रूप का जोड़ा है। दोनों को साथ-साथ लेकर ही चलना पड़ता है। अर्थ-चिंतन एक स्वतंत्र साधना है। गायत्री के एक-एक शब्द में सन्निहित अर्थ और भाव पर पाँच-मिनट भी विचार किया जाए तो एक बार पूरा एक गायत्री मंत्र करने में कम-से-कम आधा या एक घंटा लगना चाहिए। अधिक तन्मयता से यह अर्थ-चिंतन किया जाए तो पूरे एक मंत्र की भावनाएँ हृदयंगम करने में कई घंटे लग सकते हैं। मंत्रजप उच्चारण जितनी जल्दी से हो जाता है, उतनी जल्दी उसके शब्दों का अर्थ ध्यान में नहीं लाया जा सकता। इसलिए जप के साथ अर्थ-चिंतन की बात सर्वथा अव्यावहारिक है। अर्थ-चिंतन तो एक स्वतंत्र साधना है जिसे जप के समय नहीं, वरन् कोई अतिरिक्त समय निकालकर करना चाहिए।

🔴 जप योग-साधना का एक अंग है। योग चित्तवृत्तियों के निरोध को कहते हैं। ज पके समय चित्त एक लक्ष्य में लगा रहना चाहिए। यह कार्य ध्यान द्वारा ही संभव है। इसलिए विज्ञ उपासक जप के साथ ध्यान किया करते है। ‘नाम’ के साथ ‘रूप’ की संगति मिलाया करते हैं। यही तरीका सही भी है।

🔵 साधना की आरंभिक कक्षा साकार उपासना से शुरू होती है और धीरे-धीरे विकसित होकर वह निराकार तक जा पहुँचती है। मन किसी रूप पर ही जन्मता है, निराकार का ध्यान पूर्ण परिपक्व में नहीं कर सकता है, आरंभिक अभ्यास के लिए वह सर्वथा कठिन है। इसलिए साधना का आरंभ साकार उपासना से और अंत निराकार उपासना में होता है। साकार और निराकार उपासनाएँ दो कक्षाएँ है। आरंभ में बालक पट्टी पर खड़िया और कलम से लिखना सीखता है, वही विद्यार्थी कालाँतर में कागज, स्याही और फाउण्टेन पेन से लिखने लगता है। दोनों स्थितियों में अंतर तो है, पर इसमें कोई विरोध नहीं है। जो लोग निराकार और साकार का झगड़ा उत्पन्न करते हैं वे ऐसे ही हैं, जैसे पट्टी-खड़िया और कागज-स्याही को एक दूसरे का विरोध बताने वाले।

🔴 जब तक तन स्थिर न हो तब तक साकार उपासना करना उचित है। गायत्री जप के साथ माता का एक सुँदर नारी के रूप में ध्यान करना चाहिए। माता के चित्र गायत्री परिवार द्वारा प्रकाशित हुए हैं, पर यदि उनसे भी सुँदर चित्र किसी चित्रकार की सहायता से बनाए जा सकें तो उत्तम हो। सुँदर-से-सुँदर आकृति की कल्पना करके उसे अपनी सगी माता मानकर जप करते समय अपने ध्यान क्षेत्र में प्रतिष्ठित करना चाहिए।

🌹 -अखण्ड ज्योति – मई 2005 पृष्ठ 20

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