मंगलवार, 1 नवंबर 2016

👉 दूषित अहंभाव

🔴 जो अहंभाव जीवात्मा को संसार में फँसाता है, कंचन और कामिनी में लुब्ध कर देता है, वह अहंभाव वास्तव में दूषित है। यही अहंभाव जीव और आत्मा के बीच बहुत बड़ा भेदभाव उत्पन्न कर देता है। यही अहंभाव हमारे भीतर रह कर बोलता रहता है। पानी के ऊपर लाठी से चोट मारने पर उसके दो भाग होते दिखाई पड़ते हैं पर वास्तव में विचार करने पर जल एक ही होता है, केवल लाठी के कारण पृथक दिखाई देने लगता है हमारा अहंभाव लाठी के समान है।

🔵 उस लाठी को त्याग दो तो जल एक ही है। यह दोषयुक्त अहंभाव का स्वरूप क्या है? ‘मैं’ करके बोलता है पर ‘मैं’ का आशय वह नहीं समझता। मेरे पास इतना धन है, मेरे पास इतने बड़े बड़े आदमी आते हैं अगर किसी ने मेरा अपमान कर दिया या कुछ ले लिया तो उसे मारा पीटा जाता है, उसे हर तरह से तंग किया जाता है, मुकदमा चलाया जाता है, उस समय अहंभाव यही कहता है कि इसने मेरा अपमान क्यों किया?

🔴 कुछ लोग साधन, ज्ञान द्वारा अहंभाव को त्यागने का प्रयत्न करते है, पर अधिकाँश लोगों में वह कुछ न कुछ बचा ही रहता है। चाहे जितना ब्रह्म-विचार करो पर अन्त में यह अहंभाव कभी न कभी सर ऊँचा किए बिना नहीं रहता। पीपल के पेड़ को आज काट डालो, पर दूसरे दिन सबेरे देखोगे तो उसमें दो-चार नये अंकुर उगे दिखाई ही पड़ेंगे। इसलिए सच्चे हृदय से ईश्वर का स्मरण करके उनका आश्रय लेने से ही दूषित अहंभाव से छुटकारा मिल सकता है।

🌹 -रामकृष्ण परमहंस
🌹 अखण्ड ज्योति मई 1963 पृष्ठ 1

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