सोमवार, 19 सितंबर 2016

👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 20 Sep 2016




👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 20 Sep 2016




👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 21 Sep 2016




👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 21 Sep 2016





👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 22 Sep 2016




👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 22 Sep 2016


👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 26 Sep 2016



👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 26 Sep 2016




👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 24 Sep 2016


🔴 गृहस्थाश्रम विषय भोग की सामग्री नहीं, स्वार्थमयी लालसा और पापमयी वासना का विलास मंदिर नहीं, वरन् दो आत्माओं के पारस्परिक सहवास द्वारा शुद्ध आत्म-सुख, प्रेम और पुण्य का पवित्र प्रासाद है। वात्सल्य और त्याग की लीलाभूमि है। निर्वाण प्राप्ति के लिए शान्ति कुटीर है।

🔵 भोगवादी दृष्टिकोण वाले समाज में सांस्कृतिक गतिविधियों का अर्थ भी नाच-गाने, कामोत्तेजना और सस्ते मनोरंजन तक सिमट कर रह गया है, किन्तु वास्तविक सांस्कृतिक गतिविधि वह है जो व्यक्ति को सांस्कृतिक चेतना से संपन्न, सुसंस्कारित बनाए। उसमें सिद्धान्तों, विचारों की समझ पैदा करे और सही दृष्टि दे। जब तक व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने की ओर ध्यान नहीं दिया जाएगा, उसकी भौतिक वृत्तियों को ही प्रधानता देकर उभारा-उछाला जाता रहेगा तब तक समाज में पशु प्रवृत्तियों का प्राधान्य भी बना ही रहेगा।

🔴 हमें अपना, अपने बच्चों का, अपने समाज का पौरुष नष्ट होने से बचाना अभीष्ट हो तो कामुकता की प्रवृत्तियों से बचाव करना भी आवश्यक है। इनके द्वारा जो हानि हमारी हो सकती है उन पर बार-बार विचार करें, उसके खतरे से जनसाधारण को सचेत करें और यह प्रतिज्ञा करें-करावें कि हम अपने व्यक्तिगत जीवन में कामुक प्रवृत्तियों से दूर रहकर नारी मात्र के प्रति परम पवित्र भावनाएँ रखेंगे। अश्लीलता के नरक से बचकर संयमशीलता के स्वर्ग की ओर कदम बढ़ाना हम सबके लिए नितान्त आवश्यक है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 23 Sep 2016

🔴 महामानव ही किसी युग के समाज की वास्तविक सम्पदा होते हैं। उनकी उदारता एवं चरित्र निष्ठा से प्रभावित होकर लोग अनुकरण के लिए तैयार होते हैं। श्रेष्ठता का संतुलन उन्हीं के प्रयासों से बना रहता है। उत्कृष्ट एवं उदात्त संवेदनाओं को अपनाकर ही कोई महामानव बन पाता है। इसके बिना कितनी ही बुद्धिमत्ता एवं सम्पदा रहने पर भी मनुष्य स्वार्थ परायण ही बना रहता है। उसकी क्षमता निज के छोटे दायरे में ही अवरुद्ध बनी पड़ी रहती है और रुके हुए जोहड़ के सड़े पानी की तरह दुर्गन्ध फैलाती है।

🔵 प्रमादी अधिक घाटे में रहते हैं। शरीर कोल्हू के बैल की तरह चलता रहता है, पर वह सब बेगार भुगतने एवं भार ढोने की तरह होता है। फलतः कर्म कौशल के उत्साह भरे आलोक की झाँकी नहीं मिलती। किसी कार्य को पूरे मनोयोग के-उमंग और उत्साह के साथ न किया जाय तो उसमें विद्रूप, अधूरापन ही परिलक्षित होता रहेगा। ऐसे कर्मों को कुकर्म तो नहीं, पर अकर्म अवश्य ही कहा जाएगा। वे काने, कुबड़े, लँगड़े, लूले और कुरूप होते हैं, उनसे कर्त्ता को श्रेय प्राप्त होना तो दूर, उलटे उपहासास्पद बनना पड़ता है।

🔴 जिस भी कार्य में, जिस भी दिशा में प्रवीणता प्राप्त करनी हो  उसका उत्साह एवं तत्परतापूर्वक दैनिक अभ्यास करना नितान्त आवश्यक है। किसी बात को सुन-समझ भर लेने से कोई काम नहीं बनता। प्रवीणता तब आती है, जब उन कार्यों को दैनिक अभ्यास में प्रमुखता दी जाय और उन्हें लम्बे समय तक लगातार जारी रखा जाय।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 22 Sep 2016

🔴 उच्च स्तरीय आदर्शों को प्राप्त करने के लिए मन को नियोजित कर सकना और उसे बलपूर्वक अभीष्ट लक्ष्य में प्रवृत्त किये रहना प्रौढ़ चेतना का ही काम है। उसी में यह सामर्थ्य है कि इन्द्रियों को विलासी लिप्सा से विरत रहने को फौजी आदेश देने और उनका पालन कराने में सफल हो सके। आलस्य शरीर की जड़ता और प्रमाद मन की जड़ता है। इसे उलटकर चित्त शक्ति का अनुशासन स्थापित करना आंतरिक प्रगल्भता के अतिरिक्त और किसी आधार पर संभव नहीं हो सकता।

🔵 प्रोत्साहन अपने आप में एक चमत्कार होता है। प्रशंसा और प्रोत्साहन से मनुष्य अपनी शक्ति और सामर्थ्य से कई गुना काम कर जाता है। प्रोत्साहन और प्रशंसा वह जादू की छड़ी है जिसको छूकर साधारण बंदर महावीर बन जाता है। नास्तिक छात्र नरेन्द्र, स्वामी विवेकानंद हो जाता है। कृष्ण के प्रोत्साहन से साधारण ग्वाल-बालों ने गिरि-गोवर्धन उठाने में सहयोग दिया। हम भी बिना एक पैसा खर्च किए दूसरों का भारी उपकार करने का यह गुण अपने में विकसित करके परमार्थ का पुण्य प्राप्त करते रह सकते हैं।

🔴 आज सभ्यता के प्रति अनास्था उत्पन्न हो रही है। अवज्ञा और उच्छृंखलता को शौर्य, साहस एवं प्रगतिशीलता का चिह्न माना जाने लगा है। नैतिक मर्यादाएँ उपहासास्पद और सामाजिक मर्यादाएँ अव्यावहारिक कही जाने लगी ंहंै। फलतः उद्धत आचरण और विकृत चिंतन के प्रति रोष प्रकट करने के स्थान पर उन्हें सहन करने तथा कभी-कभी तो प्रोत्साहन करने तक की प्रवृत्ति देखी जाती है। यह सब थोड़ी ही मात्रा में क्यों न हो, है भयंकर।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 21 Sep 2016


🔴 जिज्ञासा सबसे बड़ा गुण है। महत्त्वाकाँक्षी होना अच्छा है, परन्तु सही मार्ग खोजने के लिए, न कि बुराइयों को प्रोत्साहन देने के लिए। ज्ञान की भूख पूरी करने और सही दिशा की  ओर ले जाने से मनुष्य विद्वान् बन जाता है।

🔵 जीवन में सफलता पाने के लिए आत्म- विश्वास उतना ही जरूरी है, जितना जीने के लिए भोजन। कोई भी सफलता बिना आत्म- विश्वास के मिलना असंभव है। आत्म-विश्वास वह शक्ति है, जो तूफानों को मोड़ सकती है, संघर्षों से जूझ सकती और पानी में भी अपना मार्ग खोज लेती है।

🔴 यह विचार सही नहीं है कि सम्पत्ति बढ़ जाने से मनुष्य का स्तर ऊँचा उठता है और प्रगतिशील परिस्थितियाँ बनती चली जाती हैं। यह तथ्य आंशिक रूप से ही सत्य है। भौतिक जीवन में अधिक सुविधा साधन मिलें यह बहुत अच्छी बात है, उससे विकास क्रम में सहायता मिलती है, पर यह यथार्थता भी भुला देने योग्य नहीं है कि घटिया व्यक्तित्व एक तो प्रगति कर ही नहीं सकेंगे, यदि कर भी लेंगे तो उपलब्ध साधनों का दुरुपयोग करके उलटे और विपत्ति के दलदल में फँसेंगे।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 20 Sep 2016


🔴 भौतिक असंतोष एक प्रकार से मद्यपान की तरह है। उसकी उग्रता मनुष्य को इतना अधीर बना देती है कि उचित-अनुचित का भेद किये बिना वह कुछ भी करने पर उतारू हो जाता है। इस आवेग में जिन्हें लक्ष्य की पूर्णतया विस्मृति हो जाती है, ऐषणाओं की ललक मनुष्य को एक प्रकार से मदान्ध बना देती है। होती तो उससे भी  प्रगति है, पर वह परिणामतः अवगति से भी मँहगी पड़ती है। अस्तु, भौतिक असंतोष को हेय और आत्मिक असंतोष को सराहनीय माना गया है। सुख पाने के लालच में संतोष को गँवा बैठना अदूरदर्शितापूर्ण है।

🔵 आशावादी दृष्टिकोण एक दैवी वरदान है। आशा पर पाँव रखकर ही मनुष्य अपने जीवन का सारा ताना-बाना बुनता है। आशा ही सुखी रखती है, आशा ही संतुष्ट बनाती है, आशा ही जीवन है। उसे त्यागकर निराशा की मृत्यु का वरण हम क्यों करें? जितने दिन जीना है उतने दिन उत्साहपूर्वक जियें, मन और आत्मा को उन्मुक्त रखकर जियें। हमें सदैव इस बात पर भरोसा होना चाहिए कि हम आज की अपेक्षा कल निश्चित रूप से आगे बढ़े हुए होंगे-ऊँचे चढ़े होंगे।

🔴 संतोष आंतरिक और आत्मिक होता है। यह आदर्शवादी कर्तव्य-निष्ठा के अतिरिक्त और किसी माध्यम से उपलब्ध नहीं हो सकता। उत्कृष्ट चिंतन और आचरण के पीछे कर्त्तव्यपालन की आस्था काम करती है। इस आस्था को व्यवहार में परिणत होने का जितना ही अवसर मिलता है, उतना ही संतोष होता है। मानवतावादी, सज्जनोचित, अनुकरणीय चरित्र निष्ठा जिस अनुपात से फलवती होती है, उसी अनुपात से संतोष मिलता है।






🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 23 Sep 2016




👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 23 Sep 2016




👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 24 Sep 2016




👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 24 Sep 2016




👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 25 Sep 2016




👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 25 Sep 2016




👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 19 Sep 2016

🔴 असफलताओं का दोष भाग्य, भगवान्, ग्रह दशा अथवा संबंधित लोगों को देकर मात्र मन को बहलाने की आत्म-प्रवंचना की जा सकती है, उसमें तथ्य तनिक भी नहीं है। संसार के प्रायः सभी सफल मनुष्य अपने पुरुषार्थ से आगे बढ़े हैं। उन्होंने कठोर श्रम और तन्मय-मनोयोग का महत्त्व समझा है। यही दो विशेषताएँ जादू की छड़ी जैसा काम करती हैं और घोर अभाव की-घोर विपन्नताओं की परिस्थितियों के बीच भी प्रगति का रास्ता बनाती हैं।

🔵 विपत्ति को टालने अथवा हलका करने का सबसे सस्ता और सबसे हलका नुसखा यह है कि कठिनाई को हलकी माना जाय और उसके हल हो जाने पर विश्वास रखा जाय। सही एवं भरपूर प्रयत्न करना ऐसी ही मनःस्थिति में संभव हो सकता है। जबकि लड़खड़ाता हुआ चिंतन तो और भी अधिक गहरे दलदल में फँसा देता है। उज्ज्वल भविष्य की आशा छोड़ दी जाय तो फिर चारों ओर अंधकार  ही अंधकार दिखाई देगा और हलकी सी कठिनाई को पार करना भी पहाड़ उठाने जैसा भारी मालूम पड़ेगा।

🔴 साहस सदा बाजी मारता है। अंदर का शौर्य बाह्य जीवन में पराक्रम और पुरुषार्थ बनकर प्रकट होता है। कठिनाइयों के साथ दो-दो हाथ करने की खिलाड़ी जैसी उमंग मनुष्य को खतरा उठाने और अपनी विशिष्टता प्रकट करने के लिए प्रेरित करती है। साहसी लोग बड़े-बड़े काम कर गुजरते हैं। बड़े कदम उठाने में पहल तो उन्हें ही करनी पड़ती है, पर पीछे कहीं न कहीं से सहयोग भी मिलता है और साधन भी जुटते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मचिंतन के क्षण 16 Dec 2018

ऐसा कोई नियम नहीं है कि आप सफलता की आशा रखे बिना, अभिलाषा किये बिना, उसके लिए दृढ़ प्रयत्न किये बिना ही सफलता प्राप्त कर सको। प्रत्ये...