रविवार, 10 जुलाई 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 July 2016


🔴 स्पष्ट है कि मनेाबल छोटी-छोटी सफलताएँ प्राप्त करते-करते विकसित होता है। वह आसमान से किसी पर नहीं टपकता। छोटे कदम, छोटे प्रयोग, छोटी सफलता का क्रम चलता रहे तो मनुष्य क्रमशः अधिक आत्म विश्वासी बनता जाता है और इस आधार पर विकसित हुई प्रतिभा के सहारे अपने शरीर तंत्र के मनःसंस्थान के हर कलपुर्जे को क्रिया-कुशल बनाकर सचमुच इस स्थिति में जा पहुँचता है कि उसे अतिरिक्त शक्ति संपन्न, असाधारण महत्त्व एवं सामर्थ्य का व्यक्ति समझा जा सके।

🔵 अगर हम चाहते हैं कि बच्चा हमारा आज्ञाकारी बने, जो बात हम कहें वह उसकी उपयोगिता को समझे-स्वीकार करे तथा उसी के अनुसार आचरण करे तो हमें पहले उसका श्रद्धास्पद बनना होगा। बालकों के लिए श्रद्धेय बनने का एकमात्र उपाय है-मधुर स्नेह की अभिव्यक्ति। जोर-जबर्दस्ती से बच्चे आपके आदेश को मान लेंगे, उस समय वैसा आचरण भी कर लेंगे, पर जोर-जबर्दस्ती का जो एहसास उन्हें रहेगा वह उनके मन में आपके प्रति विद्रोह के बीच बोयेगा। यह विद्रोह आगे चलकर बड़ा होने पर फूटेगा।

🔴 वाणी से असत्य वचन, चापलूसी, परनिन्दा, कटुभाषण, व्यर्थ वार्तालाप का त्याग करना चाहिए, क्योंकि ये अशुभ और अनैतिक हैं। इनसे जीवन में कलह, पश्चाताप, लड़ाई-झगड़े, अशान्ति पैदा हो सकते हैं। परस्पर संबंध खराब हो जाते हैं। उन सभी दृश्यों तथा प्रसंगों से दूर रहें जिनसे दूषित मनोभावों, वासनाओं को पोषण मिलता हो। मनुष्य जो कुछ भी देखता है उसकी प्रतिक्रिया मन पर होती है। उस दृश्य से संबंधित जो वासना मन में होती है, वह प्रबल हो उठती है और मनुष्य को वैसा ही करने की प्रेरणा देती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 July 2016


🔴 आज मित्रता की आड़ लेकर शत्रुता बरतने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इसे चतुरता, कुशलता समझा जाता है और इस प्रयास में सफल व्यक्ति आत्म-श्लाघा भी बहुत करते हैं। साथी को मित्रता के जाल में फँसाकर उसकी बेखबरी का-भोलेपन का अनुचित लाभ उठा लेना यही आज तथाकथित चतुर लोगों की नीति बनती जा रही है। ऐसी दशा में मित्र और शत्रु की कसौटी को हर घड़ी साथ रखने की आवश्यकता है।

🔵 समर्पण की सच्ची साधना है- अंतःकरण में न कोई छल, न छद्म। अपनी बौद्धिक क्षमताएँ, यश, सक्रियता, प्रगति सब ध्येय के प्रति अर्पित हों।  यह सौभाग्य जिन प्रयोजनों को मिल जाते हैं, चाहे वे सांसारिक हों या आध्यात्मिक, उनकी सफलता की आधी मंजिल तत्काल पूर्ण हो जाती है। साथ ही उस समर्पित आत्मा को ईश्वरीय सान्न्ध्यि का एक ऐसा दिव्य लाभ इसी साधना से मिल जाता है, जिसके लिए योगाभ्यास और जन्म-जन्मांतरों के दोष-परिमार्जन की एक कठिन  और लम्बी साधना पूरी करनी पड़ती।

🔴 किसी का सम्मान करने का अर्थ है- बदले में उसका सम्मान पाना। दूसरे कम कीमत में सम्मान पाने की बात बन ही नहीं सकती। सादगी से रहा जाय, शालीनता बरती जाये और दूसरों को संतुष्ट रखकर उन  पर अपना प्रभाव छोड़ने की कला सीखी जाये, इससे बढ़कर अपने आपको बड़ा बनाने-ऊँचा उठाने का कोई श्रेष्ठ उपाय है ही नहीं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं...